एवं-व्रत: स्व-प्रिया-नाम-कीर्त्या
जातानुरागो द्रुत-चित्त उच्चै:।
हसत्यथो रोदिति रौति गायत्य
उन्मद-वन नृत्यति लोक-बाह्य:।
"सर्वोच्च भगवान के पवित्र नाम का जप करके व्यक्ति ईश्वर के प्रेम के स्तर पर आता है। तब भक्त प्रभु के एक शाश्वत सेवक के रूप में अपनी प्रतिज्ञा में दृढ़ हो जाता है, और वह धीरे-धीरे परम व्यक्तित्व भगवान के एक विशेष नाम और रूप से बहुत जुड़ जाता है। जैसे-जैसे उसका हृदय उत्साही प्रेम से पिघलता है, वह बहुत जोर से हंसता है या रोता है या चिल्लाता है। कभी-कभी वह पागल की तरह गाता और नाचता है, क्योंकि वह जनता की राय के प्रति उदासीन होता है।" (भागवतम 11.2.40)
