श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 229
 
 
श्लोक  2.5.229 
भवन्ति सम्पत्त्य्-उदयेन यस्य
सदा महोन्मत्त-विचेष्टितानि
न यद् विना सञ्जनयेत् सुखं सा
नव-प्रकारापि मुकुन्द-भक्तिः
 
 
अनुवाद
जब प्रेम परिपक्व हो जाता है, तो व्यक्ति अनिवार्य रूप से समय-समय पर एक पागल व्यक्ति की तरह व्यवहार करने लगता है। और ऐसे प्रेम के बिना भगवान मुकुंद की नौ प्रकार की भक्ति भी वास्तविक सुख नहीं दे सकती।
 
When love matures, one inevitably begins to behave like a madman from time to time. And without such love, even the nine types of devotion to Lord Mukunda cannot bring true happiness.
तात्पर्य
विनियमित अभ्यास में भक्ति सेवा का उद्देश्य व्यक्ति को प्रेम के स्तर पर ले जाना है। केवल प्रेम की पूर्णता को साकार करके ही कोई वास्तव में सुखी हो सकता है। इस प्रेम के लक्षण स्पष्ट हैं और किसी अन्य प्रकार की सफलता से बिल्कुल अलग हैं:

एवं-व्रत: स्व-प्रिया-नाम-कीर्त्या

जातानुरागो द्रुत-चित्त उच्‍चै:।

हसत्यथो रोदिति रौति गायत्य

उन्मद-वन नृत्यति लोक-बाह्य:।

"सर्वोच्च भगवान के पवित्र नाम का जप करके व्यक्ति ईश्वर के प्रेम के स्तर पर आता है। तब भक्त प्रभु के एक शाश्वत सेवक के रूप में अपनी प्रतिज्ञा में दृढ़ हो जाता है, और वह धीरे-धीरे परम व्यक्तित्व भगवान के एक विशेष नाम और रूप से बहुत जुड़ जाता है। जैसे-जैसे उसका हृदय उत्साही प्रेम से पिघलता है, वह बहुत जोर से हंसता है या रोता है या चिल्लाता है। कभी-कभी वह पागल की तरह गाता और नाचता है, क्योंकि वह जनता की राय के प्रति उदासीन होता है।" (भागवतम 11.2.40)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)