श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 224
 
 
श्लोक  2.5.224 
दैन्यं तु परमं प्रेम्णः
परीपाकेण जन्यते
तासां गोकुल-नारीणाम्
इव कृष्ण-वियोगतः
 
 
अनुवाद
दैन्य अपने चरम पर तब प्रकट होता है जब प्रेम, भगवान का शुद्ध प्रेम, पूर्ण परिपक्वता पर पहुँच जाता है, जैसा कि गोकुल की स्त्रियों में हुआ था, जब वे कृष्ण से अलग हो गई थीं।
 
Humility reaches its peak when love, pure love of God, reaches its full maturity, as it did in the case of the women of Gokul when they were separated from Krishna.
तात्पर्य
साधारण दैन्य मानवीय प्रयास से विकसित किया जा सकता है, लेकिन एक प्रकार का दैन्य भी है लौकिक से परे, जो परम भगवान के अनुग्रह को प्राप्त करने से आता है। इस श्लोक में शब्द तू इन विशिष्ट प्रकार के दैन्यों के विपरीत है। भौतिक दुनिया में लगभग हर कोई कृष्ण से अलग है, लेकिन अधिकांश लोगों को कभी भी दैन्य का अनुभव नहीं होता है क्योंकि उनके पास कोई प्रेम नहीं है। इसलिए वे कभी भी दुख से मुक्त नहीं हो सकते और सच्चा सुख प्राप्त नहीं कर सकते। पारलौकिक दैन्य को प्राप्त करने के लिए, किसी को कृष्ण से प्रेम करना सीखना होगा जिस भाव से गोपियों ने किया था जिसका नेतृत्व श्री राधा ने किया था जब कृष्ण उन्हें मथुरा जाने के लिए छोड़ कर चले गए थे। हम गोपियों के विरह-भाव के उदाहरण से समझ सकते हैं, अलगाव में उनके प्रेम की भावनाएँ, यह विशेष दैन्य तभी उत्पन्न होता है जब, श्री कृष्ण की असाधारण दया से, एक भक्त जिसने कृष्ण की मिठास को महसूस किया है, उसके हृदय में अलगाव के भाव में असाधारण प्रेम विकसित हो जाता है। जैसे-जैसे प्रेम श्रेष्ठता की डिग्री में प्रकट होता है, वैसे ही दैन्य भी होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)