श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 221
 
 
श्लोक  2.5.221 
तत् कर्म-ज्ञान-योगादि-
साधनाद् दूरतः स्थितम्
सर्वत्र नैरपेक्ष्येण
भूषितं दैन्य-मूलकम्
 
 
अनुवाद
वह प्रेममय भक्ति कर्म, ज्ञान और योग जैसी साधनाओं से सर्वथा भिन्न है। प्रत्येक स्तर पर वह इनके प्रति उदासीनता से सुशोभित है, और उसका मूल दैन्य, परम विनम्रता है।
 
That loving devotion is completely different from the practices of karma, jnana, and yoga. It is adorned with indifference to these at every level, and its root is humility, absolute humility.
तात्पर्य
इहाँ पर प्रश्न यह है कि प्रेममय सेवा के साथ क्या निर्धारित कर्तव्य और शुद्धिकरण के अन्य उपाय जारी रखे जाने चाहिए। क्या कर्म (वर्णाश्रम नियमों का पालन) या ज्ञान (आत्मा और भौतिकता के बीच भेदभाव की खेती) को जारी रखना चाहिए? समाधि में योग और ध्यान के अष्टांग अभ्यास के बारे में क्या? और त्याग, मंत्रों का जाप और अन्य अनुशासनों के बारे में क्या? यहाँ नारद उत्तर देते हैं कि कर्म से शुरू होकर ये सभी अनुशासन ईश्वर के प्रेम की साधना में सहायता कर सकते हैं, परंतु भक्ति अभ्यास के शुरुआती चरणों में ही वे बहुत अधिक उपयोगी हैं। एक बार साधना-भक्ति ने अपने फल—रागानुगा-भक्ति, सहज भक्ति—को प्राप्त कर लिया है और विशेष रूप से एक बार प्रेम प्रकट हो गया है, जो कि रागानुगा-भक्ति का फल है, तो अब उन अन्य प्रथाओं के लिए भक्त के जीवन में कोई स्थान नहीं रह जाता है। सच्चाई यह है कि प्रेम कर्म और ज्ञान जैसे अन्य उपायों से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए भक्तों को उन उपायों की उपेक्षा करनी चाहिए और बस सुनने, जप करने, याद रखने इत्यादि की भक्ति सेवा में खुद को व्यस्त रखना चाहिए। इस बिंदु पर पहले से ही विस्तार से इस भाग के दूसरे अध्याय के अंत में, भागवत महामृत की महिमा के संदर्भ में चर्चा की जा चुकी है। महान अधिकारियों ने कहा है: कायेन दूरे व्रजिनं त्याजंती, जपंतं अंत:-करणे हसन्ती, समाधि-योगे च बहिर भवंती, संदृश्यते कापि मुकुंद-भक्तिः "भगवान मुकुंद के लिए भक्ति सेवा को व्यक्तिगत रूप से देखा जा सकता है जैसे ही वह उन लोगों से बहुत दूर भागती है जो फलदायी अनुष्ठान करते हैं, और उन लोगों पर हंसती है जो अपने दिमाग में मौन मंत्र जपते हैं, और उन लोगों से बचती है जो ध्यान योग का अभ्यास करते हैं।" इस जीवन और अगले जीवन में अभ्यास और उपलब्धि के अपने सभी चरणों में भक्ति-योग हमेशा भौतिक इच्छाओं के प्रति उदासीनता के आभूषण से सजाया जाता है। यह सत्य है कि भक्ति को आंतरिक रूप से सूक्ष्म शरीर के साथ किया जाता है या बाह्य रूप से किसी के भौतिक शरीर और इंद्रियों और शरीर के बाहरी साथ किया जाता है। जब कोई माध्यमिक साधनों और लक्ष्यों को प्रमुख बनने देता है, तो वह भक्ति से विचलित हो जाता है। सबसे आवश्यक सहायता - और शुद्ध भक्ति के लिए एक उम्मीदवार को हमेशा इससे मदद लेनी चाहिए - अत्यंत विनम्रता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)