श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 219
 
 
श्लोक  2.5.219 
तद्-एक-रस-लोकस्य
सङ्गे ’भिव्यक्ततां स्वतः
प्रयास्यद् अपि तद् वस्तु
गोपनीयं प्रयत्नतः
 
 
अनुवाद
जिन लोगों का एकमात्र रुझान शुद्ध प्रेम में भक्ति की ओर है, उनके साथ वह प्रेम स्वतः ही प्रकट हो जाता है। फिर भी उसे छुपाए रखने के लिए बहुत प्रयास करना चाहिए।
 
For those whose only inclination is devotion in pure love, that love manifests itself naturally. Yet, great effort must be made to conceal it.
तात्पर्य
प्रेम को प्राप्त करने का सबसे तेज तरीका उन लोगों के संग रहना है जो उसके मूल्य को समझते हों। प्रथम श्रेणी के पवित्र वैष्णवों का संगति में रहने से एक अभिलाषी के हृदय में प्रेम उत्पन्न हो जाता है। पर जब कृष्ण के प्रति प्रेम परिपक्व होने लगता है, तब एक भक्त को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि वह अपने उल्लास को सार्वजनिक रूप से प्रकट न करे। एक कहावत है, गोपयत मात्र-जार-वत् "एक को प्रेम को छुपाकर रखना चाहिए, जैसे कि कोई इस बात को छुपाए कि उसकी माँ का कोई प्रेमी है।" प्रेम का अनुभव कर रहे एक भक्त कभी भी अपने आंतरिक उल्लास को केवल वैष्णवों के बीच अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने के छोड़कर प्रकट नहीं करेगा। फिर भी, जैसा कि यहाँ svataḥ ("अपनी मर्जी से") शब्द से संकेत मिलता है, एक विह्वल भक्त की स्थिति एक ऐसे सामान्य व्यक्ति की तरह होती है जो अपने प्रियजन से इतने लंबे समय से अलग रहा हो कि समय ने उसके दर्द को ढँक दिया हो, लेकिन इतना लंबा नहीं कि अपने प्रियजन के दोस्तों से मिलना उसे फिर से अचानक पीड़ा में न डाल दे। प्रायस्यत शब्द भविष्य काल में है, जिसका तात्पर्य है कि प्रेम को छिपाकर रखने का निर्देश केवल प्रेम के पूर्ण रूप से प्रकट होने से पहले लागू होता है। एक बार पूरी तरह से विकसित हो जाने पर, प्रेम को जब भी वह चाहता है खुद को प्रदर्शित करने से रोका नहीं जा सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)