आस्तेऽनंतोऽव्ययो विष्णुः
पुराण-पुरुषोत्तमः|
मुक्तिं ददाति यो देवः
सप्तधा भक्त-वत्सलः|
स्मरणाद भक्षणाद यानात्
तथा नामानुकीर्तनात्|
क्षेत्रे वासाद असु-त्यागाद्
दर्शनाच्च यथा तथा||
"असीमित अचूक विष्णु, मूल परम पुरुष, वहाँ (पुरी में) रहते हैं| वह भक्त जो अपने भक्तों पर बहुत दयालु है, सात तरीकों से मुक्ति प्रदान करता है: पुरी में उनके भक्तों को उन्हें याद करने, उनके भोजन के अवशेष खाने, तीर्थयात्रा करने, उनके नामों का बार-बार जप करने, उस आवास में रहने, अपनी प्राणवायु को त्यागने या उन्हें देखने से मुक्ति मिल जाती है| "
श्री स्कंद पुराण पुष्टि करता है:|
यस्मादर्थाज्जगदिदं
सम्भूतं स-चराचरम्|
सोऽर्थो दारु-स्वरूपेण
क्षेत्रे जीव इव स्थितः||
“वह वही व्यक्ति है जिसने इस ब्रह्मांड को उसके सभी चर और अचर प्राणियों के साथ बनाया है, श्री क्षेत्र में लकड़ी के रूप में विद्यमान है|”
इसलिए, क्योंकि कृष्ण व्रज-भूमि की तरह ही पुरी में भी उसी स्वतंत्रता के साथ आनंद लेते हैं, गोप-कुमार को पुरी में वह सब कुछ प्राप्त करने में सक्षम होना चाहिए जो वह चाहते हैं।
