श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 205
 
 
श्लोक  2.5.205 
क्षणात् स्वास्थ्यम् इवासाद्य
दृष्ट्वा मां दीन-मानसम्
सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा
मुनीन्द्रः पुनर् आह सः
 
 
अनुवाद
क्षण भर बाद वे लगभग सामान्य हो गए। मुझे निराश देखकर, उन महात्माओं में श्रेष्ठ ने पुनः बात की और मधुर वचनों से मुझे सांत्वना दी।
 
After a moment he was almost back to normal. Seeing me despondent, the greatest of the saints spoke again and consoled me with kind words.
तात्पर्य
गोपा-कुमार को नारद को परमानंद में पागल देखकर चिंता हुई कि उनके अपने लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन हो सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)