ईश्वर की उपासना करते हुए इंद्र तथा दान मांगने आये वामन भगवान् के इच्छानुसार दान देते हुए बलि महाराज दोनों ने ही श्रेष्ठ कर्मों का सम्पादन इस प्रकार किया कि पूजा-पाठ की सामग्री उन्होंने परमात्म स्वरूप भगवान् के हाथों में समर्पित की। यह उनके लिए श्रेष्ठ कार्य करने का एकमात्र उपयुक्त मार्ग था क्योंकि परमेश्वर को अर्पित किये बिना कोई भी अनुष्ठान फलदायी नहीं होता।
यहाँ 'कौशिक' शब्द का अर्थ है इंद्र पुरंदर जो महर्षि कुशिक के वंशज होने के कारण कौशिक कहलाते हैं, किंतु कौशिक ऋषि विश्वामित्र का भी दूसरा नाम है। भगवान् रामचंद्र के अवतार के समय अनेक मंत्रों और शास्त्रों का अध्ययन कराने जैसे अनेक प्रकार से सत्कार तथा आश्रम में भोजन आदि सभी प्रकार से विश्वामित्र ने भगवान् की पूजा की थी। यह सर्वविदित है कि इस प्रकार अनेक दृष्टियों से विश्वामित्र महान् बने विशेषतः उन्होंने भगवान् के चरण-कमलों की भक्ति प्राप्त की। इस प्रकार जिस प्रकार देवता समूह में इंद्र प्रधान होते हैं, उसी प्रकार ऋषियों में विश्वामित्र की प्रतिष्ठा हो गई थी।
श्रीकृष्ण भगवान् ने गोपियों को परमानंद प्रदान किया तथा अपने प्रेम के अधीन हो गये, क्योंकि गोपियाँ उन्हें अपने प्राणों से भी बढ़कर मानती थीं। 'विहार' शब्द से यह सूचित होता है कि गोपियों के साथ श्रीकृष्ण के विहार अत्यंत सुखद थे। 'व्रज-योषिताम्' (व्रज की स्त्रियों का) शब्दों से यह ध्वनि निकलती है कि गोपियों के प्रति कृपा करना श्रीकृष्ण के लिए उचित था, क्योंकि ये व्रज-योषिताएँ (गोपियाँ) उनके प्रति अति स्नेहशील थीं। 'श्रम' शब्द का आशय है कि श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ खेल-कूद और गायन से प्राप्त थकान का बहुत ही चतुराई से प्रतिकार किया, क्योंकि उन्होंने अपने स्पर्श से उनकी थकान को दूर कर दिया और अपने सौगंधि-गंधी हाथ से उन्हें अत्यंत आनंद दिया। जिन प्रकार फूल की सूक्ष्म गंध कुछ ही व्यक्तियों को ही सुगंधित लग सकती है, उसी प्रकार व्रज की गोपियों जैसे प्रिय भक्तों द्वारा ही श्रीकृष्ण के सौंदर्य और आकर्षण का पूर्ण आनंद लिया जा सकता है।
