श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 199
 
 
श्लोक  2.5.199 
समर्हणं यत्र निधाय कौशिकस्
तथा बलिश् चाप जगत्-त्रयेन्द्रताम्
यद् वा विहारे व्रज-योषितां श्रमं
स्पर्शेन सौगन्धिक-गन्ध्य् अपानुदत्
 
 
अनुवाद
"उस कमल-हाथ को दान देकर पुरंदर और बलि ने स्वर्ग के राजा इंद्र का पद प्राप्त किया और रास नृत्य की आनंदमय लीलाओं के दौरान, जब भगवान ने गोपियों के पसीने को पोंछा और उनकी थकान को दूर किया, तो उनके चेहरों के स्पर्श से वह हाथ मीठे फूल की तरह सुगंधित हो गया।"
 
"By donating that lotus-hand Purandara and Bali attained the position of Indra, the king of heaven, and during the blissful pastimes of the Rasa dance, when the Lord wiped the sweat of the gopis and removed their fatigue, that hand became fragrant like a sweet flower by the touch of their faces."
तात्पर्य
इसके बाद कि श्रीकृष्ण भगवान् से शरण पानेवालों के समस्त भय कैसे दूर करते हैं, शुक्राचार्य ने बताया कि श्रीकृष्ण भगवान् अपने भक्तों को भौतिक अभिलाषाएँ शेष रहने पर भी कल्याण करते हैं और अपने सर्वस्व का समर्पण करनेवाले भक्तों को वे कैसे स्वयं को समर्पित कर देते हैं।

ईश्वर की उपासना करते हुए इंद्र तथा दान मांगने आये वामन भगवान् के इच्छानुसार दान देते हुए बलि महाराज दोनों ने ही श्रेष्ठ कर्मों का सम्पादन इस प्रकार किया कि पूजा-पाठ की सामग्री उन्होंने परमात्म स्वरूप भगवान् के हाथों में समर्पित की। यह उनके लिए श्रेष्ठ कार्य करने का एकमात्र उपयुक्त मार्ग था क्योंकि परमेश्वर को अर्पित किये बिना कोई भी अनुष्ठान फलदायी नहीं होता।

यहाँ 'कौशिक' शब्द का अर्थ है इंद्र पुरंदर जो महर्षि कुशिक के वंशज होने के कारण कौशिक कहलाते हैं, किंतु कौशिक ऋषि विश्वामित्र का भी दूसरा नाम है। भगवान् रामचंद्र के अवतार के समय अनेक मंत्रों और शास्त्रों का अध्ययन कराने जैसे अनेक प्रकार से सत्कार तथा आश्रम में भोजन आदि सभी प्रकार से विश्वामित्र ने भगवान् की पूजा की थी। यह सर्वविदित है कि इस प्रकार अनेक दृष्टियों से विश्वामित्र महान् बने विशेषतः उन्होंने भगवान् के चरण-कमलों की भक्ति प्राप्त की। इस प्रकार जिस प्रकार देवता समूह में इंद्र प्रधान होते हैं, उसी प्रकार ऋषियों में विश्वामित्र की प्रतिष्ठा हो गई थी।

श्रीकृष्ण भगवान् ने गोपियों को परमानंद प्रदान किया तथा अपने प्रेम के अधीन हो गये, क्योंकि गोपियाँ उन्हें अपने प्राणों से भी बढ़कर मानती थीं। 'विहार' शब्द से यह सूचित होता है कि गोपियों के साथ श्रीकृष्ण के विहार अत्यंत सुखद थे। 'व्रज-योषिताम्' (व्रज की स्त्रियों का) शब्दों से यह ध्वनि निकलती है कि गोपियों के प्रति कृपा करना श्रीकृष्ण के लिए उचित था, क्योंकि ये व्रज-योषिताएँ (गोपियाँ) उनके प्रति अति स्नेहशील थीं। 'श्रम' शब्द का आशय है कि श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ खेल-कूद और गायन से प्राप्त थकान का बहुत ही चतुराई से प्रतिकार किया, क्योंकि उन्होंने अपने स्पर्श से उनकी थकान को दूर कर दिया और अपने सौगंधि-गंधी हाथ से उन्हें अत्यंत आनंद दिया। जिन प्रकार फूल की सूक्ष्म गंध कुछ ही व्यक्तियों को ही सुगंधित लग सकती है, उसी प्रकार व्रज की गोपियों जैसे प्रिय भक्तों द्वारा ही श्रीकृष्ण के सौंदर्य और आकर्षण का पूर्ण आनंद लिया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)