श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  2.5.190 
सौभाग्य-गन्धं लभते न यासां
सा रुक्मिणी या हि हरि-प्रियेति
ख्याताच्युताशास्त-कुलीन-कन्या-
धर्मैक-नर्मोक्ति-भिया मृतेव
 
 
अनुवाद
रुक्मिणी श्रीहरि की प्रिय रानी के रूप में प्रसिद्ध हैं, किन्तु भगवान अच्युत की इच्छा को संतुष्ट करने के लिए कुलीन कन्या के धार्मिक सिद्धांतों को त्यागने तथा एक बार उनके कुछ हास्य-व्यंग्य से भयभीत होकर लगभग मर जाने के बावजूद, वे गोपियों के सौभाग्य का लेशमात्र भी प्राप्त नहीं कर पातीं।
 
Rukmini is renowned as the beloved queen of Sri Hari, but despite abandoning the religious principles of a noble girl to satisfy the desire of Lord Acyuta and once being frightened and almost dying by some of his jokes, she does not attain even a fraction of the good fortune of the gopis.
तात्पर्य
पिछले श्लोक में नारद ने उद्धव के दो कथनों (श्लोक 183 और 185) पर टिप्पणी की: "हर क्षण, मैं नंद के व्रज की महिलाओं के चरणों से निकली धूल को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ" और "ओह, मुझे भाग्यशाली बनने दें, वृंदावन की एक झाड़ी, लताओं या जड़ी-बूटियों में से एक बनें। अब, इस श्लोक और अगले में, वह कथन (श्लोक 187 में किया गया) पर टिप्पणी करते हैं "यह दिव्य उपकार कभी भी भाग्य की देवी पर नहीं दिया गया।" उस पाठ (नायं श्रीयो अंग) में श्री नाम को या तो भगवान नारायण की पत्नी या द्वारका में कृष्ण की पहली रानी, रुक्मिणी को संदर्भित करने के लिए समझा जा सकता है। जब उद्धव ने पहली बार इस श्लोक को बोला था, गोकुल की अपनी यात्रा के दौरान, रुक्मिणी और कृष्ण का विवाह अभी तक नहीं हुआ था, लेकिन वर्तमान संदर्भ में, क्योंकि उद्धव इस श्लोक का पाठ वैकुण्ठ के द्वारका में फिर से कर रहे हैं, श्री नाम रुक्मिणी को उचित रूप से इंगित कर सकता है। या शायद जब उद्धव ने पहली बार इस श्लोक का उच्चारण किया था, तो उन्हें यह जानने के लिए रहस्यमय दृष्टि थी कि रुक्मिणी कृष्ण की पत्नी होगी। किसी भी मामले में, महा-लक्ष्मी रुक्मिणी का विस्तार है, इसलिए लक्ष्मी और रुक्मिणी भिन्न नहीं हैं। इसलिए, उन दोनों को हरि-प्रिया कहा जा सकता है। और क्योंकि श्रीमती रुक्मिणी लक्ष्मी से बड़ी भक्त है, कि गोपियां लक्ष्मी से बहुत बड़ी हैं, यह निहित है। रुक्मिणी ने अविवाहित लड़कियों के लिए स्वीकार्य व्यवहार के मानकों को छोड़ दिया, सिर्फ इसलिए कि कृष्ण उसे चाहते थे। इस नियम की अनदेखी करते हुए कि एक अभिजात लड़की को उसके पिता द्वारा विवाह में पेश किया जाना चाहिए, उसने कृष्ण को उसका अपहरण करने के लिए आमंत्रित किया। और जब एक बार कृष्ण ने उसे छेड़ा, तो वह इस डर से लगभग मर गई कि वह उसे अस्वीकार कर रहा है। उस अवसर पर भगवान कृष्ण ने कहा था:

अथात्मनो अनुरूपं वै

भजस्व क्षत्रियर्षभम्

येन त्वं आशीषः सत्यः

इहामुत्र च लप्स्यसे

"अब आपको निश्चित रूप से एक अधिक उपयुक्त पति को स्वीकार करना चाहिए, जो शाही आदेश का एक प्रथम श्रेणी का व्यक्ति है जो आपको वह सब कुछ प्राप्त करने में मदद कर सकता है जो आप इस जीवन में और अगले जन्म में चाहते हैं।" (भागवतम 10.60.17) और श्री शुकदेव गोस्वामी वर्णन करते है:

तस्याः सु-दुःख-भय-शोक-विनष्ट-बुद्धेर

हस्ताच् छ्लद-वलयतो व्यजनं पपाता

देहश्च विकलव-धियाः सहसैव मुह्यन्

रंभेव वायु-विहतो प्रविकीर्य केशान

"रुक्मिणी का मन दुख, भय और शोक से अभिभूत था। उसके हाथ से चूड़ियाँ फिसल गईं और उसका पंखा जमीन पर गिर गया। अपने विचलन में वह अचानक बेहोश हो गई, उसके बाल उड़ गए जैसे उसके शरीर हवा से उड़े हुए केले के पेड़ की तरह जमीन पर गिर गया।" (भागवतम 10.60.24)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)