श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 172
 
 
श्लोक  2.5.172 
श्री-गोलोकं गन्तुम् अर्हन्त्य् उपायैर्
यादृग्भिस् तं साधकास् तादृशैः स्युः
द्रष्टुं शक्ता मर्त्य-लोके ’पि तस्मिंस्
तादृक्-क्रीडं सु-प्रसन्नं प्रभुं तम्
 
 
अनुवाद
जिन साधनाओं के द्वारा भक्तजन श्रीगोलोक को प्राप्त होते हैं, उन्हीं साधनाओं के द्वारा वे भगवान को मृत्युलोक में ब्रजभूमि में पूर्णतया संतुष्ट होकर गोकुल के समान लीला करते हुए देखते हैं।
 
Through the same practices by which devotees attain Shri Golok, they see God in the mortal world, completely satisfied in Brajbhoomi, performing his pastimes like in Gokul.
तात्पर्य
गोकुल में भगवान को खोजने के लिए गोप-कुमार को पृथ्वी पर उतरने की जरूरत नहीं है, लेकिन उन्हें कृष्ण के व्यक्तिगत निवास को प्राप्त करने के लिए साधना, विशेष अभ्यास सीखने की जरूरत है। नंद महाराज जैसे अंतरंग सहयोगियों के लिए कोई आध्यात्मिक अभ्यास की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे शाश्वत व्रज-वासी हैं। लेकिन अन्य सभी के लिए, सावधान प्रयास की आवश्यकता होती है।

इस मार्ग पर, हर कोई समान स्तर की सफलता प्राप्त नहीं करता है। एक भक्त कृष्ण भावना को कृष्ण को देखने में सक्षम होने के बिंदु तक विकसित कर सकता है, लेकिन हो सकता है कि वह उसे अपने अंतरंग भक्तों के साथ वृंदावन के विशेष अतीत (तद्र्क-कृष्ण) का आनंद लेते हुए देखने में सक्षम न हो। जब अधिक उन्नत है, तो एक वैष्णव कभी-कभी कृष्ण को अपने वृंदावन अतीत में उलझा हुआ देख सकता है लेकिन अपने आनंदमय आनंद (सु-प्रसन्नम) के पूर्ण दायरे को प्रदर्शित नहीं करता है। और यहां तक कि ऐसा वैष्णव भी कृष्ण के शाश्वत अतीत में प्रवेश करने और कृष्ण के साथ पूर्ण स्वतंत्रता में खेलने के लिए भाग्यशाली नहीं हो सकता है। कृष्ण भावना की उच्चतम सिद्धि शायद ही कभी प्राप्त होती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)