श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 167
 
 
श्लोक  2.5.167 
मन्ये ’हम् एवं परम-प्रियेभ्यस्
तेभ्यः प्रदेयस्य सु-दुर्लभस्य
द्रव्यस्य कस्यापि समर्पणार्हो
वदान्य-मौलेर् व्यवहार एषः
 
 
अनुवाद
मैं सोचता हूँ कि इस प्रकार का व्यवहार सबसे उदार, सबसे उदार व्यक्ति के लिए उपयुक्त है, क्योंकि वह अपने सबसे प्रिय मित्रों को सबसे अधिक वांछनीय वस्तु, सबसे दुर्लभ वस्तु प्रदान करता है।
 
I think this kind of behavior is appropriate for the most generous, the most liberal person, because he gives the most desirable thing, the most rare thing, to his dearest friends.
तात्पर्य
वृन्दावन के भक्तों के प्रति उनके व्यवहार के लिए किसी को भी कृष्ण की आलोचना नहीं करनी चाहिए, जो एक क्षण के अंश के लिए भी उनके अभाव को सहन नहीं कर सकते। यहाँ नारद कहते हैं कि कृष्ण के विरुद्ध उनकी कोई ऐसी शिकायत नहीं है, हालाँकि कुछ लोग हो सकते हैं। नारद समझते हैं कि कृष्ण का छोड़ना वास्तव में उनका व्रजवासियों को विप्रलम्भ-भाव का सबसे दुर्लभ खजाना देने का तरीका है। सृष्टि में कोई भी अन्य उस उपहार के योग्य नहीं है, इसलिए व्रजवासी इसके प्राप्तकर्ता होने के लिए बहुत प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार श्रीमद्भागवतम (10.47.27) में उद्धव ने कृष्ण की गर्लफ्रेंड को बताया:

सर्वआत्मभावोऽधिकृतो

भवतीनाम् अधोक्षजे

विरहेण महाभागा

महान् मेऽनुग्रह: कृत:

"हे गौरवशाली गोपियों, तुमने पारलौकिक भगवान के प्रति अविभाजित प्रेम के विशेषाधिकार का अधिकारपूर्वक दावा किया है। वास्तव में, कृष्ण के लिए अपने प्रेम को उनसे अलग करके प्रदर्शित करके, तुमने मुझे महान दया दिखाई है।" यद्यपि कृष्ण पारलौकिक ईश्वर हैं, अधोक्षज, भौतिक इंद्रियों के लिए अप्रासंगिक, व्रज की गोपियों ने अपनी विशेष भक्ति से उन्हें जीत लिया है। इस प्रकार वे उन्हें कभी भी त्याग नहीं सकते। उद्धव ने गोपियों को सबसे भाग्यशाली और उदार आत्मा होने के रूप में पहचाना, जिन्होंने कृष्ण से अलग होने की पीड़ा का अनुभव किया, जबकि वे उनके साथ आमने-सामने आनंद ले रहे थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)