श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 155
 
 
श्लोक  2.5.155 
तासाम् आर्त्या गीत-वद्-रोदनाद् यः
प्रादुर्भूयानन्द-पूरं व्यधत्त
यः प्रश्नानाम् उत्तरं तद् ददौ च
स्वस्यर्णित्व-स्थापकं सो ’वतु त्वाम्
 
 
अनुवाद
उनके करुण गीत-सदृश क्रंदन से कृष्ण पुनः प्रकट हुए और उन्हें परमानंद से भर दिया। तब उन्होंने उनके प्रश्नों का जो उत्तर दिया, उससे उनकी ऋणीता सिद्ध हुई। वे प्रभु आपकी रक्षा करें।
 
Their mournful, song-like cries brought Krishna back into their wake and filled them with ecstasy. The answers he gave to their questions proved their indebtedness. May the Lord protect you.
तात्पर्य
उनके डर से द्रवित होकर, कृष्ण रास नृत्य में लौट आए और सभी गोपियों को अकथनीय आनंद की बाढ़ में डुबा दिया। तब गोपियों ने कृष्ण से उनके प्रति उनके रवैये के रहस्य के बारे में पूछा:

भजतोऽनुभजन्त्येका

एक एतद्विपर्ययाम्

नोभयांश्च भजन्त्येका

एतन्नो ब्रूहि साधु भोः

"कुछ लोग केवल उन्हीं लोगों के स्नेह का प्रतिदान करते हैं जो उनके प्रति स्नेही होते हैं, जबकि अन्य लोग उदासीन या शत्रुतापूर्ण लोगों के प्रति भी स्नेह दिखाते हैं। और फिर भी अन्य लोग किसी के प्रति स्नेह नहीं दिखाते हैं। प्रिय कृष्ण, कृपया हमें इस मामले को ठीक से समझाएँ।" (भागवतम 10.32.16) इस प्रश्न के जवाब में कृष्ण ने गोपियों से कहा:

न पारेऽहं निरवद्या-संयुजां

स्व-साधु-कृत्यं विबुधायुषापि वः

या माभजन दुर्जर-गेह-शृंखलाः

संवृश्च्य तद् वः प्रतियातु साधुना

"मैं ब्रह्मा के जीवनकाल में भी आपकी निर्मल सेवा के लिए अपने ऋण को चुकाने में सक्षम नहीं हूँ। मेरे साथ आपका संबंध निंदा से परे है। आपने मेरी पूजा की है, सभी घरेलू संबंधों को तोड़ दिया है, जिन्हें तोड़ना मुश्किल है। इसलिए कृपया अपने स्वयं के गौरवशाली कर्मों को अपना मुआवजा मानें।" (भागवतम 10.32.22) इस कथन के पूर्ण तात्पर्य पर श्री ब्रह्म-भागवतामृत के अंत में चर्चा की जाएगी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)