भजतोऽनुभजन्त्येका
एक एतद्विपर्ययाम्
नोभयांश्च भजन्त्येका
एतन्नो ब्रूहि साधु भोः
"कुछ लोग केवल उन्हीं लोगों के स्नेह का प्रतिदान करते हैं जो उनके प्रति स्नेही होते हैं, जबकि अन्य लोग उदासीन या शत्रुतापूर्ण लोगों के प्रति भी स्नेह दिखाते हैं। और फिर भी अन्य लोग किसी के प्रति स्नेह नहीं दिखाते हैं। प्रिय कृष्ण, कृपया हमें इस मामले को ठीक से समझाएँ।" (भागवतम 10.32.16) इस प्रश्न के जवाब में कृष्ण ने गोपियों से कहा:
न पारेऽहं निरवद्या-संयुजां
स्व-साधु-कृत्यं विबुधायुषापि वः
या माभजन दुर्जर-गेह-शृंखलाः
संवृश्च्य तद् वः प्रतियातु साधुना
"मैं ब्रह्मा के जीवनकाल में भी आपकी निर्मल सेवा के लिए अपने ऋण को चुकाने में सक्षम नहीं हूँ। मेरे साथ आपका संबंध निंदा से परे है। आपने मेरी पूजा की है, सभी घरेलू संबंधों को तोड़ दिया है, जिन्हें तोड़ना मुश्किल है। इसलिए कृपया अपने स्वयं के गौरवशाली कर्मों को अपना मुआवजा मानें।" (भागवतम 10.32.22) इस कथन के पूर्ण तात्पर्य पर श्री ब्रह्म-भागवतामृत के अंत में चर्चा की जाएगी।
