शुकदेव गोस्वामी ने श्रीमद भागवतम के दसवें कांड, अध्याय 29 से 33 में भी इस आध्यात्मिक आनंद को प्रकट किया है, जो कि रास-लीला को समर्पित हैं:
बाहु-प्रसार-परिरंभ-कराल-कोरु-
नीवी-स्तनालभन-नर्म-नखा-ग्र-पातैः
क्ष्वेल्यावलोक-हसितैर् व्रज-सुंदरिणाम
उत्ताम्भयन् रति-पतिम् रमयाम् चकारे
"कृष्णा ने गोपियों के चारों तरफ़ अपनी बाहें डाली और उन्हें आलिंगन में लिया। उन्होंने व्रज की खूबसूरत युवतियों के हाथों, बालों, जांघों, बेल्ट और स्तनों को छूकर, नाखूनों से खरोंच कर और उनके साथ मज़ाक करके, उनकी तरफ़ देखकर और उनके साथ हँसकर उनमें कामदेव को जगाया। इस तरह भगवान ने अपने शगलों का आनंद लिया।" (भागवतम 10.29.46)
