श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 152
 
 
श्लोक  2.5.152 
श्लाघे ’वहित्था-कृतितां हरेस् तां
तत्-काकु-जाताद् यदि सा स्थिता स्यात्
व्यक्तात्म-भावः क्षणतः स रेमे
ता मोहयन् काम-कलावलीभिः
 
 
अनुवाद
मैं भगवान की उस कुशलता की प्रशंसा कर सकता था जिसमें वे गोपियों के करुण विलाप के बाद भी अपने मन को उनसे छिपाए रख पाते। लेकिन जब वे रोने लगीं, तो उन्होंने उन्हें अपने सच्चे भाव दिखाए और उन गोपियों के साथ रमण किया, उन्हें कामदेव की समस्त कलाओं से मोहित किया।
 
I could admire the Lord's skill in concealing His feelings from the gopis despite their pitiful cries. But when they began to weep, He revealed His true feelings and engaged in love with them, captivating them with all the arts of Cupid.
तात्पर्य
भगवान् के व्यक्तित्व का पवित्र पूजन, सभी स्थित आत्माओं के दिलों में सोये मृत्युलोक के कामदेव को जगाने की शक्ति रखता है। इस पूजन को प्रस्तुत किया जाना, भगवान कृष्ण के भौतिक जगत में आने का मुख्य उद्देश्य था और इस प्रकार, पृथ्वी पर उनके शगल साधारण लोगों की गतिविधियों के समान थे। लेकिन अपने अंतरंग शगलों का प्रदर्शन करने के दौरान, उन्होंने अपनी सम्पूर्ण संपन्नता को भी दर्शाया। दसवें कांड के अंत में श्री शुकदेव द्वारा वर्णित (भागवतम 10.90.48) में, सु-स्मित-श्री-मुखेन/ व्रज-पुर-वनितानमां वर्धयन् काम-देवं: उनके आनंदित मुस्कुराते चेहरे ने हमेशा वृंदावन की गोपियों की वासना को बढ़ाया है। इस पद पर टिप्पणी करते हुए, श्रील श्रीधर स्वामी नोट करते हैं, "यह कामदेव तेजस्वी (देव) इस अर्थ में है कि उनका भौतिक संसार को जीतने का इरादा है। दूसरे शब्दों में, वो आध्यात्मिक इंद्रिय भोग के माध्यम से मुक्ति प्रदान करते हैं।"

शुकदेव गोस्वामी ने श्रीमद भागवतम के दसवें कांड, अध्याय 29 से 33 में भी इस आध्यात्मिक आनंद को प्रकट किया है, जो कि रास-लीला को समर्पित हैं:

बाहु-प्रसार-परिरंभ-कराल-कोरु-

नीवी-स्तनालभन-नर्म-नखा-ग्र-पातैः

क्ष्वेल्यावलोक-हसितैर् व्रज-सुंदरिणाम

उत्ताम्भयन् रति-पतिम् रमयाम् चकारे

"कृष्णा ने गोपियों के चारों तरफ़ अपनी बाहें डाली और उन्हें आलिंगन में लिया। उन्होंने व्रज की खूबसूरत युवतियों के हाथों, बालों, जांघों, बेल्ट और स्तनों को छूकर, नाखूनों से खरोंच कर और उनके साथ मज़ाक करके, उनकी तरफ़ देखकर और उनके साथ हँसकर उनमें कामदेव को जगाया। इस तरह भगवान ने अपने शगलों का आनंद लिया।" (भागवतम 10.29.46)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)