श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 149
 
 
श्लोक  2.5.149 
चराः स्थिरत्वं चरतां स्थिरा गताः
स-चेतना मोहम् अचेतना मतिम्
निमज्जिताः प्रेम-रसे महत्य् अहो
विकार-जाताक्रमिताः सदाभवन्
 
 
अनुवाद
चराचर जीव गतिहीन हो गए, जड़ जीव गतिमान हो गए; चेतन जीवों ने चेतना खो दी और अचेतन ने उसे प्राप्त कर लिया। वास्तव में, ये जीव और वस्तुएँ निरंतर प्रेम-रस की एक विशाल धारा में डूबी रहीं, परमानंद के अनेक रूपांतरणों से अभिभूत रहीं।
 
Living beings became motionless, inanimate beings became mobile; sentient beings lost consciousness, and the unconscious gained it. In fact, these beings and things were constantly immersed in a vast stream of love-nectar, overwhelmed by many transformations of ecstasy.
तात्पर्य
वृक्ष और दूसरे पेड़-पौधे हरकत करने लगे; उनमें नई पत्तियाँ फूटने लगीं और वे काँपने लगे। सचेतन प्राणियों में अब जीवन के बाहरी भाव नज़र नहीं आते थे और बेहोश लकड़ियाँ और पत्थर पत्तियाँ उगाते और हवा में लुढ़कते हुए ज़िंदा दिखते। ये सभी असाधारण घटनाएँ कृष्ण की बाँसुरी के गीत से उमंग की निशानी थीं। गोपियों के शब्दों मेंः

ग गोपकैरनु वनं नयतोरुदार

वेणु स्वनैः कला पदैस्तनु भृत्सु सख्यः

अस्पन्दनं गति मतां पुलकस्तरूणां

निर्योग पश कृत लक्षणयोरविचित्रम्

"प्रिय सहेलियों, जब कृष्ण और बलराम अपने ग्वाले मित्रों के साथ जंगल में से गुज़रते हैं, अपनी गायों को आगे बढ़ाते हुए, वे गायों के पिछले पैरों को दुहने के समय बाँधने के लिए रस्सियाँ लिए होते हैं। जब भगवान कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाते हैं, तो उस मधुर संगीत की वजह से चलते-फिरते जीव-जंतु दंग हो जाते हैं और स्थिर पेड़ उमंग से काँपने लगते हैं। ये चीज़ें निश्चित तौर पर बहुत अद्भुत हैं।" (भागवतं १०.२१.१९)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)