ग गोपकैरनु वनं नयतोरुदार
वेणु स्वनैः कला पदैस्तनु भृत्सु सख्यः
अस्पन्दनं गति मतां पुलकस्तरूणां
निर्योग पश कृत लक्षणयोरविचित्रम्
"प्रिय सहेलियों, जब कृष्ण और बलराम अपने ग्वाले मित्रों के साथ जंगल में से गुज़रते हैं, अपनी गायों को आगे बढ़ाते हुए, वे गायों के पिछले पैरों को दुहने के समय बाँधने के लिए रस्सियाँ लिए होते हैं। जब भगवान कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाते हैं, तो उस मधुर संगीत की वजह से चलते-फिरते जीव-जंतु दंग हो जाते हैं और स्थिर पेड़ उमंग से काँपने लगते हैं। ये चीज़ें निश्चित तौर पर बहुत अद्भुत हैं।" (भागवतं १०.२१.१९)
