श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.5.145 
गोपाश् च कृष्णे ’र्पित-देह-दैहिका-
त्मनो निजाचार-विचार-चञ्चलाः
लोक-द्वयार्थेष्व् अनपेक्षितादृता
भार्याम् अपि स्वस्य नमन्ति तत्-प्रियाम्
 
 
अनुवाद
ग्वालों ने अपना सब कुछ कृष्ण को समर्पित कर दिया—अपना शरीर, परिवार, संपत्ति और यहाँ तक कि स्वयं भी। वे ग्वाले अपनी रीति-रिवाजों और आवश्यकताओं से बेपरवाह, इस लोक या परलोक में सफलता की परवाह न करते हुए, कृष्ण के प्रति इतना आदर रखते थे कि वे अपनी पत्नियों को भी प्रणाम करते थे, क्योंकि वे पत्नियाँ कृष्ण को प्रिय थीं।
 
The cowherds dedicated everything to Krishna—their bodies, families, possessions, and even themselves. Unconcerned with their customs and needs, regardless of success in this world or the next, they held Krishna in such reverence that they even bowed to their wives, who were dear to Krishna.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण के आकर्षण से सिर्फ़ अपरिचित व्यक्ति ही नहीं भ्रमित थे, बल्कि उनके अपने घनिष्ठ मित्र और परिवार भी भ्रांत थे। वृज के गोपों ने अपने बच्चों और पत्नियों सहित अपना सब कुछ श्रीकृष्ण को अर्पण कर दिया। इस तरह हरि-वंश (2.12.46) में गोपगण श्री नंद महाराज से कहते हैं:

अद्य-प्रभृति गोपानां

गवां गोष्ठस्य चानघ

आपत्सु शरणं कृष्णः

प्रभुश्चायत-लोचनः

"आज से, हे पापरहित, ख़तरनाक स्थितियों में चौड़ी आंखों वाले कृष्ण हमारे गोपों, गायों और हमारे पूरे समुदाय के लिए आश्रय स्थल होंगे। वे हम सभी के स्वामी होंगे।" "हमारे पूरे समुदाय" वाक्यांश का अर्थ है कि गोप अपने कथन में युवा गोपियों को भी शामिल करना चाहते थे, लेकिन वे कृष्ण के साथ उनके रिश्ते का सीधे तौर पर उल्लेख करने में बहुत शर्मिंदा थे। जैसा कि गोप अच्छी तरह से जानते हैं, यहां तक कि उनकी पत्नियां भी कृष्ण की हैं; इसलिए, जब गोप उनका उल्लेख भ्र्या के रूप में करते हैं, तो वे जिन महिलाओं के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार हैं, उनका मतलब कृष्ण के आनंद के लिए है, न कि अपने लिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)