श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  2.5.144 
समाधि-भङ्गो ’थ महा-मुनीनां
विकार-जातस्य च जन्म तेषु
तत्-काल-चक्र-भ्रमणानुवर्ति-
चन्द्रादि-नित्याशु-गतेर् निरोधः
 
 
अनुवाद
महामुनियों ने, अपने ध्यान भंग होते ही, अपने भीतर परमानंद के परिवर्तन महसूस किए। और चंद्रमा तथा अन्य ग्रहों की गतियाँ, जो तीव्र और अविराम थीं और जो समय के चक्र का सख्ती से अनुसरण करती थीं, रुक गईं।
 
The great sages, upon being interrupted from their meditation, felt blissful changes within themselves. And the movements of the moon and other planets, which had been rapid and unstoppable and strictly following the cycle of time, stopped.
तात्पर्य
केवल देवताओं और ऋषियों के बीच के वफादार आस्तिक ही नहीं बल्कि आत्म-संतुष्ट अवैयक्तिकवादी भी कृष्ण की बाँसुरी से मंत्रमुग्ध हो गए थे। उन अवैयक्तिकवादियों ने भी ईश्वर के प्रेम के सात्विक भावों का अनुभव किया- कंपन, रोम-रोम होना, आँसुओं की बाढ़, और ऐसा ही बहुत कुछ- जिसके बारे में उन्होंने ब्रह्म के आनंद पर दार्शनिक विचार करते समय कभी सपना नहीं देखा होगा। और उन स्वतंत्र ऋषियों के अलावा, प्रेम से अभिभूत अंतरिक्ष के ग्रह भी थे, जिनकी गतियाँ सामान्य रूप से समय के नियम द्वारा तय की जाती हैं। ग्रहों ने दंग रह जाने के सात्विक भाव को महसूस किया, जैसा कि गोपियों के शब्दों से संकेत मिलता है: "ब्रह्मा, शिव, इंद्र और अन्य मुख्य देवता ध्वनि को सुनकर भ्रमित हो जाते हैं।" (भागवतम् 10.35.15) उल्लिखित "अन्य मुख्य देवताओं" में चंद्र, सूर्य और ग्रहों के अन्य शासक शामिल हैं। श्रील शुकदेव गोस्वामी ने भी रास-लीला के अपने वर्णन में ग्रहों के उल्लास का उल्लेख किया है:

कृष्ण-विक्रीड़ितं वीक्ष्य

मुमुहुः खे-चर-स्त्रियां

कामादिताः शशाङ्कश्च

स-गणो विस्मितो 'भवत्

"देवताओं की पत्नियाँ, हवाई जहाज से कृष्ण की चंचल गतिविधियों को देखकर, मुग्ध हो गईं और वासना से उत्तेजित हो गईं। वास्तव में, यहाँ तक कि चंद्रमा और उसके दल, तारे, भी चकित हो गए। " (भागवतम् 10.33.18)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)