श्री-गोप्य ऊचुः
वाम-बाहु-कृत-वाम-कपोलो
वलगिता-भ्रूर अधरापिता-वेणुम्
कोमलॉङ्गुलीभिर आश्रिता-मार्गम्
गोप्य ईरयति यत्र मुकुंदः
व्योम-यान-वनितारः सह सिद्हैर्
विस्मिताः तद उपाधर्य सा-लज्जाहः
काम-मार्गण-समर्पित-चित्ताः
कश्मलं ययुर अपस्मृता-नीव्याः
"गोपियों ने कहा: जब मुकुंद अपनी वेणु को अपने होठों से लगाकर उसे बजाते हैं, उसकी छेदों को अपनी कोमल अंगुलियों से बंद करते हुए, तब वह अपना बायाँ गाल अपनी बाईं बाँह पर टिकाते हैं और अपनी भौंहों को नचाते हैं। उस समय आकाश में अपने पतियों, सिद्धों के साथ यात्रा कर रही देवियाँ विस्मित हो जाती हैं। जैसा वे उन धुनों को सुनती हैं, वे अपने मन को वासनाओं की खोज में हारते हुए पाकर शर्मिंदा हो जाती हैं, और अपने संकट में वे यह भूल जाती हैं कि उनके वस्त्रों की पट्टियाँ ढीली हो रही हैं।" (भागवतम् 10.35.2-3)
कृष्ण की बाँसुरी की महिमा करते हुए, श्रीला सनातन गोस्वामी यहाँ एक सत्रह छंद वाली चर्चा शुरू करते हैं, अगले विषय पर, अशेष-माहत्त्व-माधुरी ("कृष्ण के सभी उत्कृष्ट गुणों की मिठास")। 140 से 149 तक के पाठ विशेष रूप से कृष्ण की बाँसुरी की महिमा करते हैं। कृष्ण की बाँसुरी के बारे में सब कुछ असाधारण है। चूँकि पूरी दुनिया में इसके जैसा कोई अन्य वस्तु नहीं है, अतः इसकी तुलना करने के लिए कुछ भी नहीं है। कोई उस बाँसुरी की महानता को केवल उसकी ध्वनि के अद्भुत प्रभावों का अध्ययन करके ही समझ सकता है। कृष्ण के अलावा कोई और ऐसी बाँसुरी का मालिक नहीं हो सकता, और वास्तव में कृष्ण इसे कभी अपने हाथों से नहीं छोड़ते हैं; बल्कि, वह बाँसुरी को अपने होठों का अमृत पिलाने का हर मौका लेते हैं।
