वामे पाणौ मसृण-कवलं तत्-फलाण्य अंगुलीषु
"वह अपने हाथ में दही और चावल की एक बहुत अच्छी तैयारी रख रहे थे, जिसमें उनकी उंगलियों के बीच उपयुक्त फलों के टुकड़े थे।" (भागवतम 10.13.11)
इति उक्त्वाद्रि-दरी-कुंज-
गह्वरेष्व आत्म-वत्सकान
विचिन्वन् भगवान कृष्णः
सपाणि-कवलो ययौ
“’मुझे बछड़ों को खोजने जाने दो,’ कृष्ण ने कहा। ’अपने आनंद को भंग मत करो।’ फिर, अपने हाथ में दही और चावल लेकर, भगवान कृष्ण तुरंत अपने दोस्तों के बछड़ों को खोजने के लिए निकल गए। अपने दोस्तों को खुश करने के लिए, उन्होंने सभी पहाड़ों, झाड़ियों, पहाड़ी गुफाओं और संकरे रास्तों में खोजबीन शुरू की।" (भागवतम 10.13.14)
वास्तव में, कृष्ण अभी भी एक साल बाद अपने हाथ में उस निवाले को पकड़े हुए थे, जब ब्रह्मा माफी मांगने आए थे। भगवान ब्रह्मा ने कहा:
नौमीड्य ते ’भ्र-वपुषे तडिद-अंबरāya
गुंजावतमंस-परिपिच्छ-लसन-मुखाय
वन्य-स्रजे कवल-वेत्र-विषाण-वेणु-
लक्ष्म-श्रिये मृदु-पदे पशुपांगजाया
“मेरे प्रिय भगवान, आप ही पूजनीय भगवान, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं और इसलिए मैं केवल आपको प्रसन्न करने के लिए अपनी विनम्र प्रार्थना और प्रार्थना करता हूं। हे ग्वालों के राजा के पुत्र, आपका पारलौकिक शरीर एक नए बादल की तरह गहरा नीला है, आपका वस्त्र बिजली की तरह चमकदार है, और आपके चेहरे की सुंदरता आपके गुंजा के झुमके और आपके सिर पर मोर पंख से बढ़ी है। विभिन्न जंगली फूलों और पत्तियों की माला पहने हुए, और एक चरवाहों की छड़ी, एक भैंस का सींग और एक बांसुरी से सुसज्जित, आप अपने हाथ में भोजन का एक निवाला लेकर खूबसूरती से खड़े हैं।" (भागवतम 10.14.1)
