श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.5.12 
तिष्ठन् पुरः श्री-गरुडो ’स्ति तं स्तुवन्
पादाब्ज-संवाहन-कृत् तथोद्धवः
रहस्य-वार्ताभिर् असौ प्रियाभिः
सन्तोषयन्न् अस्ति निजेश्वरं तम्
 
 
अनुवाद
श्री गरुड़ भगवान के समक्ष खड़े होकर उनकी स्तुति कर रहे थे। और उद्धव ने भगवान के चरणकमलों को सहलाया और स्नेहपूर्ण आत्मीय वाणी से उन्हें प्रसन्न किया।
 
Sri Garuda stood before the Lord and praised Him. Uddhava caressed the Lord's feet and pleased Him with affectionate and kind words.
तात्पर्य
द्वारका में कृष्ण के प्रिय मित्र, उद्धव को सुधर्मा सभागार में भगवान के चरणों की मालिश करने का सौभाग्य प्राप्त है। भगवान के इतने निकट होने के कारण, वह वे बातें कह सकता है जिन्हें अन्य उपस्थित लोगों को नहीं सुनना चाहिए। वह भाषण के मास्टर, बृहस्पति का भी शिष्य है, इसलिए वह एक आदर्श विद्वान और कृष्ण के प्रिय सलाहकार हैं। भले ही कोई उसके द्वारा कृष्ण से कही जा रही बातों को सुनने के लिए काफी करीब खड़ा हो, उसका भाषण इतना परिस्थितिजन्य था कि उसके गोपनीय सार का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता था। यद्यपि उद्धव जिस भगवान से बात कर रहे थे, उन्होंने स्वयं को उद्धव के प्रभाव में डाल दिया था, वह भगवान निजेस्वरम थे, सर्वोच्च नियंत्रक, सबसे चतुर और साधन संपन्न होने पर भी क्या कहें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)