यद् यन् न पूर्वं कृतम् अस्ति केनचित्
स्वयं च तेनापि कथञ्चन क्वचित्
तत् तत् कृतं सुन्दर-बाल्य-चेष्टया
तत्र व्रजे यच् च पुरास दुष्करम्
अनुवाद
जो पहले कभी किसी ने नहीं किया था, जो उन्होंने स्वयं कभी किसी बहाने या किसी भी परिस्थिति में नहीं किया था, और जो उस समय तक किसी के लिए भी असंभव था - यह सब उन्होंने व्रज में अपनी सर्व-मोहक बाल लीलाओं के दौरान किया।
What no one had ever done before, what He Himself had never done under any pretext or under any circumstances, and what was impossible for anyone till that time – all this He did during His all-enchanting childhood pastimes in Vraja.
तात्पर्य
पाठ 103 में सूचीबद्ध विषयों में से दो यथावत रह गए हैं: अशेष-महत्व-माधुरी ("उनके सभी उत्कृष्ट गुणों की मधुरता") और विलास-लक्ष्मी ("उनके मनोरंजक समय की भव्यता")। मधुरेण समापयेत ("किसी को एक मधुर बात पर ही समाप्त करना चाहिए") के सिध्दांत का पालन करते हुए, श्रील सनातन अशेष-महत्व-माधुरी के अपने विवरण को अंत के लिए सहेजना पसंद करते हैं। इस प्रकार अब वे विलास-लक्ष्मी के विषय में बताते हैं। भौतिक जगत में कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक कि भगवान ब्रह्मा, रुद्र, या कोई भी देवता, कभी भी कृष्ण द्वारा वृंदावन में किए गए अद्भुत कार्यों के समान कुछ नहीं कर पाया है। श्री नृसिंहदेव और श्री रामचंद्र सहित सर्वोच्च भगवान के अन्य अवतारों के मनोरंजक समय भी कृष्ण के मनोरंजक समय की तुलना नहीं कर सकते हैं। वैकुण्ठ में सर्वोच्च भगवान ने कभी भी इन मनोरंजक समय को अधिनियमित नहीं किया है या यहाँ तक कि उनकी नकल करके दिखाने की कोशिश भी नहीं की है। इससे पहले कि भगवान वृंदावन में अपने आकर्षक बचपन की गतिविधियों का अनावरण करें, उन्होंने आसानी से कभी भी राक्षसों को नहीं मारा और न ही अपनी शुद्ध भक्ति सेवा वितरित की।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥