जब माँ यशोदा कृष्ण को बांधकर उन्हें दंडित करना चाहती थीं, तो उन्होंने उपलब्ध सभी रस्सियों को जोड़ा, जिसमें दूध दुहने पर गायों को बाँधने वाली रस्सी भी शामिल थी, लेकिन फिर भी वह अपने बेटे को बांधने के लिए पर्याप्त लंबी रस्सी नहीं बना सकीं:
एवं स्व-गेह-दामामि
यशोदा संदधती अपि
गोपीनां सु-स्मयन्तीनां
स्मयती विस्मिताभवत्
"इस प्रकार माता यशोदा ने घर में जो भी रस्सियाँ मिलीं, उन सभी को जोड़ दिया, पर फिर भी कृष्ण को बाँधने के अपने प्रयास में असफल रहीं। मां यशोदा की सहेलियाँ, पड़ोस की बुजुर्ग गोपियाँ, मुस्कुरा रही थीं और मौज-मस्ती का आनंद ले रही थीं। इसी तरह, माता यशोदा, यद्यपि इस तरह काम कर रही थीं, वह भी मुस्कुरा रही थीं। वे सभी आश्चर्य से स्तब्ध थे।" (भागवतम् 10.9.17)
अंततः कृष्ण ने खुद को बंधे रहने के लिए सहमत हो गए, लेकिन इस तरह से-रस्सी के एक सिरे पर उनकी कमर और दूसरे सिरे पर एक बड़ा पीसने वाला मोर्टार-कि वह बाद में मोर्टार को पलट सकते थे और अधिक मक्खन चुराने के लिए इसके चौड़े आधार पर चढ़ सकते थे। श्रीमद्-भागवतम् (10.9.18-19) में श्री शुकदेव गोस्वामी बताते हैं:
स्व-मातुः स्विन्न-गात्राया
विस्स्रस्त-कबर-स्रजः
दृष्ट्वा परिश्रमं कृष्णः
कृपयासीत स्व-बंधने
एवं सन्दर्शिता ह्यंगा
हरिणा भृत्य-वश्यता
स्व-वशेनापि कृष्णेन
यस्येदम् शेश्वरं वशे
"माता यशोदा के कठोर परिश्रम के कारण, उनका पूरा शरीर पसीने से तर हो गया, और उनके बालों से फूल और कंघी गिर रहे थे। जब बालक कृष्ण ने अपनी माता को इस तरह थके हुए देखा, तो वह उनके प्रति दयालु हो गए और बंधने के लिए सहमत हो गए। हे महाराज परीक्षित, यह संपूर्ण ब्रह्मांड, भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा और भगवान इंद्र जैसे अपने महान, महान देवताओं के साथ, भगवान के व्यक्तित्व के परम नियंत्रण में है। फिर भी परम भगवान के पास एक पारलौकिक विशेषता है: वह अपने भक्तों के नियंत्रण में आते हैं। यह अब इस लीला में कृष्ण द्वारा प्रदर्शित किया गया था।"
व्रज की महिलाएँ इन लीलाओं को देखकर प्रसन्न हुईं, और कृष्ण ने उनके आनंद के लिए हरकतें करके और उनकी आज्ञाओं का पालन करके उनके लिए अपने प्रेम को और अधिक प्रोत्साहित किया। यह भी शुकदेव गोस्वामी द्वारा वर्णित है:
गोपीभिः स्तोभितो नृत्यद्
भगवान बाल-वत् क्वचित
उद्गायाति क्वचिन मुग्धः
तद्-वशो दारु-यंत्र-वत
"गोपियाँ कहती थीं, 'यदि तुम नाचोगे, मेरे प्रिय कृष्ण, तो मैं तुम्हें आधा मिठाई दूंगी।' ये शब्द कहकर या अपने हाथों को ताली बजाकर सभी गोपियों ने कृष्ण को विभिन्न तरीकों से प्रोत्साहित किया। ऐसे समय में, यद्यपि वह भगवान के परम शक्तिशाली व्यक्तित्व थे, वह मुस्कुराते थे और उनकी इच्छा के अनुसार नृत्य करते थे, जैसे कि वह उनके हाथों में एक लकड़ी की गुड़िया थे। कभी-कभी वह उनकी आज्ञा पर बहुत ऊँचे स्वर में गाते थे। इस प्रकार, कृष्ण पूरी तरह से गोपियों के नियंत्रण में आ गए।
बिभर्ति क्वचिदाज्ञप्तः
पीठकोंमान-पादुक्रम
बाहु-क्षेपं च कुरुते
स्वनाम च प्रीतिम आहन
"कभी-कभी माता यशोदा और उनकी गोपी सहेलियाँ कृष्ण से कहती थीं, 'यह वस्तु लाओ' या 'वह वस्तु लाओ।' कभी-कभी वह उन्हें लकड़ी का तख्ता, लकड़ी के जूते, या लकड़ी का मापने का बर्तन लाने का आदेश देते थे, और कृष्ण, जब इस प्रकार माताओं द्वारा आदेश दिया जाता था, तो उन्हें लाने की कोशिश करते। हालाँकि, कभी-कभी, जैसे कि इन चीजों को उठाने में असमर्थ हों, वह उनको छूते और वहीं खड़े हो जाते। बस अपने रिश्तेदारों के आनंद को आमंत्रित करने के लिए, वह अपनी ताकत दिखाने के लिए अपनी बाँहों से अपने शरीर पर प्रहार करते।
दर्शयंस्तद्-विदां लोक
आत्मनो भृत्य-वश्यताम्
व्रजस्योवाहा वै हर्षम्
भगवान बाल-चेष्ठितैः
"दुनिया भर में शुद्ध भक्तों के लिए जो उनकी गतिविधियों को समझ सकते थे, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण ने प्रदर्शित किया कि वह अपने भक्तों, अपने सेवकों के द्वारा कितने वशीभूत हो सकते हैं। इस तरह उन्होंने अपने बचपन की गतिविधियों से व्रज-वासियों के आनंद को बढ़ाया।"(भागवतम् 10.11.7-9)
इन लीलाओं द्वारा भगवान कृष्ण ने ज्ञानियों को एक स्पष्ट संदेश भेजा जो सोचते हैं कि वे उन्हें परम सत्य के रूप में अच्छी तरह से जानते हैं: "ज्ञान की प्रक्रिया के माध्यम से मुझे प्राप्त करना बिल्कुल भी आसान नहीं है। केवल भक्ति से ही मुझे शीघ्र प्राप्त किया जाता हूँ।"
