श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  2.5.102 
नात्र को ’प्य् अस्ति भिन्नो यत्
तत्रत्य-जन-वल्लभः
उद्धवस् त्वं च तत्रत्यस्
तद् गोप्यं किञ्चिद् उच्यते
 
 
अनुवाद
इस घर में कोई भी बाहरी नहीं है। उद्धव व्रजवासियों के बहुत प्रिय हैं, और आप स्वयं व्रजवासी हैं। इसलिए मैं कुछ गोपनीय बातें कह सकता हूँ।
 
There are no outsiders in this house. Uddhava is very dear to the people of Vraja, and you yourself are a resident of Vraja. Therefore, I can tell you some confidential things.
तात्पर्य
पिछले श्लोक में नारद ने गोलोक के स्वामी की महिमा के बारे में कहा था, और अगले श्लोक में वह गोलोक में भगवान द्वारा प्रदर्शित किए जाने वाले सर्वोच्च वैभव के बारे में विस्तार से बताना शुरू करेंगे। 88वें श्लोक में नारद ने इस विषय का संक्षेप में उल्लेख करते हुए कहा था, "मुझे लगता है कि वह दुनिया वास्तव में भगवान हरि के सबसे गोपनीय भगवत्ता का संपूर्ण सार प्रदर्शित करती है।" नारद उद्धव के घर में स्वतंत्र रूप से बोल सकते हैं क्योंकि वहां उपस्थित सभी लोग इस प्रकार के विषयों को सुनने के योग्य हैं। वहां बैठे सभी लोगों का भगवान के लिए एक विशेष प्रकार का प्रेम है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)