श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  2.4.97 
अहो सुखं कीदृग् इदं दुरूहम्
अहो पदं कीदृग् इदं महिष्ठम्
अहो महाश्चर्य-तरः प्रभुश् च
कीदृक् तथाश्चर्य-तरा कृपास्य
 
 
अनुवाद
अहा, कैसा अकल्पनीय सुख! कैसा परमधाम! कैसा अद्भुत गुरु! और उनकी दया कितनी अद्भुत है!
 
Ah, what unimaginable bliss! What a supreme abode! What a wonderful Guru! And how marvelous is His mercy!
तात्पर्य
गोप-कुमार 'इदम्' ('यह') शब्द का उपयोग करके यह व्यक्त करते हैं कि उन्होंने इन्हें चमत्कारों को प्रत्यक्ष देखा था। पर वो सिर्फ - 'अहो' - से ज़्यादा कुछ नहीं कहते क्योंकि वैकुण्ठ का यह वैभव किसी ओर से तुलनीय नहीं है। जो लोग इसे अभी तक नहीं देख पाए हैं, उनके लिए काफ़ी कम ही कहा जा सकता है। यह वैभव कल्पना भी नहीं किया जा सकता है, फिर इसका वर्णन तो बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)