श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.4.9 
एकदा तं निज-प्राण-
नाथं पश्यन्न् इवाग्रतः
धर्तुं धावन् गतो मोहं
न्यपतं प्रेम-विह्वलः
 
 
अनुवाद
एक बार मुझे लगा कि मेरे जीवन का स्वामी मेरे सामने खड़ा है, और मैं उसे थामने के लिए दौड़ा। प्रेम से अभिभूत होकर, मैं बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
 
At once, I felt the Master of my life standing before me, and I ran to hold him. Overwhelmed with love, I fell to the ground, unconscious.
तात्पर्य
"प्रेम विह्वल" पद बताता है कि गोप-कुमार इतना अजीब क्यों बर्ताव कर रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)