श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.4.87 
कामं दीर्घ-तमं मे ’द्य
चिरात् त्वं समपूरयः
स्वस्य मे ’पि सुखं पुष्णन्न्
अत्रैव निवस स्थिरः
 
 
अनुवाद
आज आपने आखिरकार मेरी बरसों से दबी हुई इच्छा पूरी कर दी। कृपया यहीं सदा निवास करके अपनी और मेरी खुशियों को संजोए रखें।
 
Today you have finally fulfilled a wish I've held dear for years. Please reside here forever and cherish your happiness and mine.
तात्पर्य
यहाँ भगवान कहते हैं, "मैंने तुम्हारे लिए क्या भला किया है? पर तुम यहाँ आकर मेरे साथ सबसे बड़ा भला किया है।" भगवान आशा करते हैं कि गोपा-कुमार अपने असंतोष को भूल जाएँगे जिसके कारण वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते रहते हैं और इसके बजाय वैकुण्ठ में रहना चुनेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)