श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  2.4.80 
हर्षस्य काष्ठां परमां ततो गतो
नृत्यन् महोन्माद-गृहीत-वन् मुहुः
भ्रश्यन्न् अमीभिः परम-प्रयासतः
सम्प्रापितः स्थैर्यम् अथ प्रबोधितः
 
 
अनुवाद
तब मुझे परम आनंद का अनुभव हुआ। मैं मानो पागलपन से ग्रस्त होकर इधर-उधर नाचने लगा और लड़खड़ाता रहा। लेकिन प्रभु के सेवकों ने बड़ी मेहनत से मुझे शांत किया और आखिरकार मैं उस समाधि से जागा।
 
Then I experienced supreme bliss. I began dancing and staggering around as if possessed by madness. But the Lord's servants painstakingly calmed me down, and I finally awoke from my trance.
तात्पर्य
गोप-कुमार को प्रभु नारायण के मुख से ये वाक्य बड़े विह्वल कर देने वाले लगे। परन्तु सच्चाई यह है कि यह 'विह्वलता' चेतना की सिद्धावस्था है। जहाँ दुःखी होने वाला व्यक्ति परमानन्द का चरम अनुभव करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)