श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 59-60
 
 
श्लोक  2.4.59-60 
प्रति-द्वारान्तरे गत्वा
गत्वा तत्-प्रतिहारिभिः
प्रणम्यमानो यो यो हि
तत्-प्रदेशाधिकारवान्

दृश्यते स स मन्येत
जगद्-ईशो मया किल
पूर्व-वत् सम्भ्रमावेशात्
नम्यते स्तूयते मुहुः
 
 
अनुवाद
जैसे ही मैं हर दरवाज़े से अंदर गया, मैंने देखा कि पहरेदार स्थानीय अधीक्षक को प्रणाम कर रहे थे, इसलिए मैंने मान लिया कि वे ही इस ब्रह्मांड के स्वामी हैं। पहले की तरह ही श्रद्धा से अभिभूत होकर, मैं बार-बार झुककर प्रार्थना कर रहा था।
 
As I entered each door, I saw the guards bowing to the local superintendent, so I assumed he was the master of the universe. Overwhelmed with reverence as before, I bowed and prayed repeatedly.
तात्पर्य
गोपा-कुमार भगवान को देखने के लिए इतने उत्सुक थे कि उन्होंने भगवान के शानदार भक्तों को स्वयं भगवान समझ लिया। हर प्रवेश द्वार से गुजरने पर गोपा-कुमार अपने एस्कॉर्ट के साथ स्थानीय प्रबंधक से मिलते थे जिसकी तुलनात्मक रूप से अधिक संपन्नता उन्हें चकित करती थी। वह भगवान नारायण को देखने के लिए और अधिक उत्सुक होते जा रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)