श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.4.50 
कथञ्चित् तत्-प्रभावेण
विज्ञातं स्यान् न चान्यथा
ग्रहीतुं किल तद्-रूपं
मनसापि न शक्यते
 
 
अनुवाद
वैकुंठ को केवल उसके आध्यात्मिक प्रभाव से ही समझा जा सकता है, अन्यथा नहीं। वास्तव में, मन भी उसके स्वरूप को नहीं समझ सकता।
 
Vaikuntha can only be understood through its spiritual influence, not otherwise. In fact, even the mind cannot grasp its nature.
तात्पर्य
वैकुण्ठ के स्वामी को केवल वे लोग समझ सकते हैं और उनके लीलाओं के विभिन्न स्थानों को जान सकते हैं, जब वे अपनी विशेष शक्तियों जैसे कारुण्य (दया) द्वारा स्वयं को प्रकट करते हैं। भगवान के पसंदीदा भक्त अपनी आध्यात्मिक बुद्धि का उपयोग करके वैकुण्ठ की प्रकृति के बारे में कुछ चीजों का अनुमान लगा सकते हैं, उन चीजों के साथ तुलना करके जिन्हें उन्होंने देखा है, छुआ है, और भौतिक दुनिया में अन्यथा सामना किया है। और पूरी तरह से शुद्ध भक्त वैकुण्ठ को सीधे देख सकते हैं। हालाँकि, बाहरी मन और इंद्रियाँ आध्यात्मिक अस्तित्व को कभी नहीं समझ सकते हैं। इसलिए किसी को भी उस अस्तित्व पर एक अधिकार के रूप में बोलने का कोई अधिकार नहीं है जब तक कि उसे भगवान की दया शक्ति द्वारा अंतर्दृष्टि नहीं दी गई हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)