श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.4.46 
प्रपञ्चान्तर्-गता भोग-
परा विषयिणो यथा
बहिर्-दृष्ट्या तथेक्ष्यन्ते
ते हि मुक्तार्चिताङ्घ्रयः
 
 
अनुवाद
सतही तौर पर वैकुण्ठ के निवासी भौतिक जगत के इन्द्रिय भोगी प्रतीत हो सकते हैं, किन्तु वास्तव में उनके चरणों की पूजा मुक्त आत्माएँ करती हैं।
 
Superficially, the inhabitants of Vaikuntha may appear to be sensual enjoyers of the material world, but in reality, their feet are worshipped by liberated souls.
तात्पर्य
क्योंकि वैकुण्ठ के भक्त अपने इंद्रियों का अद्भुत तरीकों से आनंद लेते हैं, गाने और नाचने से भरा जीवन जीते हैं, कोई उन्हें माया की दुनिया के स्वार्थी भौतिकवादियों से बेहतर नहीं मान सकता है। सच्चाई यह है, हालांकि, वैकुण्ठ-वासियों के चरणों की पूजा उन उन्नत आत्माओं द्वारा की जाती है जो पदार्थ की सीमाओं को पार कर चुके हैं, इंद्रिय सुख के आकर्षण को छोड़ दिया है, और खुद को पूरी तरह से सर्वोच्च भगवान की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। यह संदेह करने का कोई वैध कारण नहीं है कि वैकुण्ठ के भक्त भौतिक इंद्रियों द्वारा प्रदान किए गए तुच्छ आनंद के आदी हैं। श्रीमद-भागवतम (3.15.17, 20) में, भगवान ब्रह्मा ने भी वैकुण्ठ के अपने विवरण में इस ओर संकेत किया है:

वैमानिकाः स-ललनाश् चरितानि शश्वद्

गायन्ति यत्र शामल-क्षपणानि भर्तुः'।

अन्तर्जलेऽनुविकसन्-मधु-माधवीनां

गन्धेन खण्डित-धियोऽप्यनिलं क्षिपन्तः।

"वैकुण्ठ ग्रहों में निवासी अपने हवाई जहाज में अपनी पत्नियों के साथ उड़ते हैं, और सदैव भगवान् के चरित्र और गतिविधियों का गायन करते हैं, जो हमेशा सभी अशुभ गुणों से रहित होते हैं। भगवान की महिमा गाते हुए, वे पानी में खिलते माधवी फूलों की उपस्थिति का भी उपहास करते हैं, जो सुगंधित और शहद से लदी होती हैं।" दूसरे शब्दों में, भले ही आनंदपूर्वक आनंद ले रहे हों, वैकुण्ठ के भक्त हमेशा भगवद व्यक्तित्व की पूजा के परमानंद में लीन रहते हैं। माधवी फूल वसंत ऋतु में खिलता है, जब इंद्रिय सुख का आकर्षण चरम पर होता है। फिर भी भले ही ऐसे आकर्षण भक्तों की इंद्रियों को उत्तेजित कर सकते हैं, लेकिन यह उन्हें उनकी भक्ति सेवा से बिल्कुल भी विचलित नहीं करता है।

यत्संकुलं हरि-पदानति-मात्र-दृष्टैर्

वैदूर्य-मारकट-हेम-मयैर्विमानैः।

येषां बृहत्-कटि-टटाः स्मित-शोभि-मुख्यः

कृष्णात्मनां न रज आदधुर उत्स्मयाद्यैः।

"वैकुण्ठ भक्तों से भरा है जो ऐसा लगता है कि भगवान हरि के चरणों में झुकने के अलावा कुछ नहीं करते हैं। यद्यपि लापीस लाजुली, पन्ना और सोने से बने अपने हवाई जहाज में यात्रा करते समय वे अपने पति-पत्नी से घिरे रहते हैं, जिनके बड़े कूल्हे और सुंदर मुस्कुराते हुए चेहरे होते हैं, वे वैकुण्ठ निवासी ऐसे मस्ती और सुंदर आकर्षण से जुनून को उत्तेजित नहीं कर सकते हैं।" कर्मी, ज्ञानी और योगी वैकुण्ठ के भक्तों जैसे इंद्रिय संतुष्टि के लिए कुछ भी प्राप्त करने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। हालाँकि, यह सभी आनंद वैकुण्ठ भक्तों को शुद्ध अच्छाई के भाव से कभी नहीं गिराता है, क्योंकि वे भगवान नारायण की प्रेममयी सेवा में पूर्ण रूप से निश्चित हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)