श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  2.4.39 
एतत्-परम-वैचित्री-
हेतुं वक्ष्यामि ते ’ग्रतः
कृष्ण-भक्ति-रसास्वाद-
वतां किं स्यान् न सुन्दरम्
 
 
अनुवाद
बाद में मैं तुम्हें इस अतिशय विविध स्वरूपों का कारण समझाऊँगा। जो लोग कृष्ण भक्ति के भावों का आनंद लेते हैं, उनके लिए क्या कोई ऐसी चीज़ है जो सुंदर न हो?
 
Later I will explain to you the reason for this immense variety of forms. For those who enjoy the sentiments of Krishna devotion, is there anything that is not beautiful?
तात्पर्य
वैकुण्ठ में सर्वोच्च प्रभु की तरह एक सदृश्य रूप में मुक्ति सभी के लिए उपलब्ध है। हम तर्कसंगत रूप से उम्मीद कर सकते हैं, इसलिए, सभी वैकुण्ठ निवासियों की चार भुजाएँ होनी चाहिए और भगवान नारायण जैसे दिखना चाहिए। फिर उनमें से कुछ मनुष्यों, बंदरों और जीवन के अन्य सभी प्रकार के रूपों की तरह क्यों दिखते थे? गोपा-कुमार ने बाद में नारद मुनि से इस विविधता के लिए निश्चित दार्शनिक व्याख्या सुनी, और वर्तमान वर्णन के दौरान गोपा-कुमार इसे अपने स्वयं के शिष्य को बताएंगे। लेकिन यह मानते हुए भी कि वैकुण्ठ में शरीरों की किस्मों के लिए एक कारण है, भगवान नारायण के भक्तों को बंदरों जैसे कुरूप शरीर क्यों मानना चाहिए? प्रतिक्रिया में यह कहा जा सकता है कि हम आम सांसारिक अनुभव से जानते हैं कि जिस किसी को भी किसी चीज़ से गहरा आकर्षण होता है वह मदद नहीं कर सकता है, लेकिन उस चीज़ को सुंदर ही देखता है, चाहे वह कुछ भी हो। यह भी आध्यात्मिक स्तर पर सच है, अन्यथा सर्वोच्च प्रभु और उनके भक्त हनुमान और जाम्बवान जैसे व्यक्तियों के प्रति इतने आकर्षित क्यों होंगे?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)