श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.4.29 
तांश् च पश्यन् पुरेवाहं
मज्जन् सम्भ्रम-सागरे
नमन् स्तुवन् निवार्ये तैः
स्निग्ध-वाग्-अमृतैस् तथा
 
 
अनुवाद
उन्हें गुज़रते देख, मैं पहले की तरह विस्मय के सागर में डूब गया। बार-बार झुककर प्रार्थना करता, और हर बार वे मुझे अमृतमय स्नेह भरे शब्दों से रोक लेते।
 
Watching him pass, I was as awestruck as ever. Again and again I bowed and prayed, and each time he stopped me with words of nectar-like affection.
तात्पर्य
ये वैकुण्ठवासी जिन्हें गोपा-कुमार ने सबसे अंतिम में गेटवे होते हुए देखा, वे सेना के कमांडर और कुछ अन्य महत्वपूर्ण अधिकारी थे जो इसलिए देर से लौट रहे थे क्योंकि वे बाहर विभिन्न ज़िम्मेदारियों के लिए व्यस्त थे। वे निवासी जो गोपा-कुमार से पहले गुजरे थे वह जल्दी में थे, अपने व्यापार में इतने तत्पर कि उनके वैभव को प्रदर्शित करने का कोई मौका नहीं मिला। इसलिए वो निवासी जिन्हें उन्होंने अब गुजरते हुए देखा वह अपेक्षाकृत अधिक वैभवशाली लग रहे थे, एक के बाद एक। गोपा-कुमार, श्रद्धा के सागर में डूबे हुए, यह समझने में असफल रहे कि ये अलग-अलग व्यक्ति सभी भगवान नारायण नहीं हो सकते। उनमें से हर एक वास्तव में अत्यधिक आकर्षक था, इसलिए जब भी गोपा-कुमार को अंततः एहसास हुआ कि ये भगवान के सेवक थे, स्वयं भगवान नहीं, तब भी उन पर एक महान व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ा कि वह सहज ही उनकी पूजा करना चाहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)