अंत में, असीम करुणा से कोमल हृदय वाले और संसार के सभी लोगों के मन को जानने वाले श्री राम ने मुझे कोमल स्नेह से सांत्वना दी। उन्होंने आदेश दिया, "द्वारका जाकर सुखी रहो।" और उन्होंने मुझे भालुओं के सरदार के साथ तुरंत विदा कर दिया।
Finally, Sri Rama, who has a heart full of infinite compassion and knows the hearts of all people in the world, consoled me with tender affection. He commanded, "Go to Dwaraka and be happy." And he immediately sent me away with the chief of the bears.
तात्पर्य
अगर भगवान ने खुद उन्हें द्वारका जाने के लिए न कहा होता, तो गोपा-कुमार कभी भी अयोध्या छोड़ने में सक्षम न होते। भगवान राम अच्छी तरह से जानते थे कि गोपा-कुमार श्री मदन-गोपाल के उपासक थे, जो विशेष रूप से उस भगवान के भक्त थे और उन्हें प्राप्त करने के लिए विशिष्ट रूप से योग्य थे। इसके अलावा, भगवान राम समझ गए थे कि यही कारण था कि गोपा-कुमार अयोध्या में कभी भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं थे, यहाँ तक कि परम आनंद का अनुभव करने के बाद और हनुमान द्वारा दयापूर्वक परामर्श दिए जाने के बाद भी। यह स्पष्ट था कि केवल द्वारका जाने से ही गोपा-कुमार को खुशी मिलेगी। परम भगवान अपने निवास से शायद ही कभी किसी को बाहर भेजते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने अपने भक्त की खुशी के लिए ऐसा किया। उन्होंने गोपा-कुमार के साथ द्वारका जाने के लिए भालुओं के राजा श्री जाम्वान को नियुक्त किया। जाम्वान भगवान कृष्ण के पुत्र सांब के दादा थे, इसलिए वह एक उपयुक्त एस्कॉर्ट थे।
इस प्रकार श्रील सनातन गोस्वामी के बृहद-भागवतामृत के भाग दो का चौथा अध्याय, “वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)”, समाप्त होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥