श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 266
 
 
श्लोक  2.4.266 
तदाकार्षं मनस्य् एतद्
दीर्घाशा फलिताधुना
वाञ्छातीतं च सम्पन्नं
फलं तत् कुत्र यान्यतः
 
 
अनुवाद
तभी मुझे ख्याल आया कि मेरी सारी बरसों की ख्वाहिशें पूरी हो गईं, मेरी उम्मीद से भी बढ़कर। और ऐसी पूर्णता मुझे और कहाँ मिल सकती थी?
 
Then it dawned on me that all my years of longing had been fulfilled, surpassing my expectations. And where else could I find such fulfillment?
तात्पर्य
प्रभु रघुनाथ की अति कृपालु सेवा गोप-कुमार की सारी इच्छाओं की पूर्ति थी, और उनके सपनों से भी कहीं अधिक थी। उन्होंने भौतिक और आध्यात्मिक ब्रह्मांडों की यात्रा की थी, परंतु वे कभी इतने पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हुए थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)