स्मृताम हृदि विन्यस्य
विद्धं दंडक-कंटकैः
स्व-पाक-पल्लवं राम
आत्म-ज्योतिर अगात ततः
"जब भगवान रामचंद्र दंडकारण्य में रहते थे, तब उनके कमल के चरण कभी-कभी कांटों से छिदे जाते थे। यज्ञ पूरा करने के बाद उन्होंने उन कमल के चरणों को उन लोगों के हृदयों में रख दिया जो हमेशा उनके बारे में सोचते हैं। फिर उन्होंने ब्रह्म-ज्योति से परे वैकुण्ठ ग्रह अपने निवास में प्रवेश किया।" उन कमल के चरणों में एक अनोखे रस का स्वाद चखा जाना है, परमानंद पूजा का एक विशेष भाव और नारद गोपा-कुमार को इसे प्राप्त करने में मदद करना चाहते हैं। विष्णु के सभी अवतारों के स्रोत श्री मदन-गोपाल की भक्ति सेवा से, वांछित सब कुछ आसानी से प्राप्त हो जाता है। फिर भी श्री रघुनाथ भगवान के एक विशेष अवतार हैं; उनकी विशेषताएँ हैं जो कोई भी बिना उनकी पूजा के विशेष भाव को विकसित किए बिना आनंद नहीं ले सकता। नारद अब गोपा-कुमार को भगवान रामचंद्र की पूजा करने की विधि में निर्देश देने की पेशकश करते हैं।
