श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 233
 
 
श्लोक  2.4.233 
कदाचिद् एव कस्मैचित्
तद्-एकार्थ-स्पृहावते
तां दद्याद् भगवान् भक्तिं
लोक-बाह्याय धीमते
 
 
अनुवाद
कभी-कभी ही परमेश्वर भक्ति प्रदान करते हैं, और वह भी केवल किसी विरले बुद्धिमान व्यक्ति को, जो संसार के विचारों से उदासीन होकर केवल भक्ति ही चाहता है।
 
Only occasionally does God grant devotion, and that too only to a rare intelligent person who, indifferent to worldly considerations, desires only devotion.
तात्पर्य
क्योंकि प्रेम-भक्ति का अभ्यर्थी सांसारिक लोगों की बुराइयों की परवाह नहीं करता है, इसलिए बदले में उसे उपेक्षा से पुरस्कृत किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)