श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 228
 
 
श्लोक  2.4.228 
विशेषतो नागर-शेखरस्य
स्वारामतादि-स्व-गुणापवादैः
अपेक्षणीया परम-प्रिया सा
काष्ठा परा श्री-भगवत्त्व-सीम्नः
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार श्रेष्ठ वीर अपने भक्तों के प्रति स्वेच्छापूर्वक समर्पित होते हैं, वह परम प्रिय और आकर्षक है, क्योंकि यह उनकी आत्म-संतुष्टि और उनके कुछ अन्य स्वाभाविक गुणों के विपरीत है। यह ईश्वरत्व की परम सिद्धि है।
 
The way in which the great heroes willingly surrender to their devotees is extremely endearing and attractive, because it contrasts with their self-indulgence and some of their other natural qualities. This is the ultimate perfection of divinity.
तात्पर्य
ईश्वर की महानता को सबसे अच्छी तरह तब देखा जाता है जब वह अपने सेवकों के अधीन हो जाते हैं। ऐसे अंतरंग व्यवहार में भगवान अपने सबसे विशेष गुणों को प्रकट करते हैं, जैसे अपने भक्तों को सुख देने के लिए अपने निःस्वार्थ प्रयास। उनके व्यक्तित्व का यह पहलू विशुद्ध वैष्णवों की प्रशंसा को आकर्षित करता है, तब भी जब यह उनकी परम स्थिति की ऐसी विशेषताओं का खंडन करता प्रतीत होता है जैसे उनकी शाश्वत आत्म-संतुष्टि, उनका जो कुछ भी वे चाह सकते हैं उसे सहज प्राप्त कर लेना, रहस्यमय योग की शक्तियों पर उनका सर्वोच्च अधिकार और इतने पर। कोई भी कृष्ण के ऐसे समय का अध्ययन करके इस विषय के बारे में और अधिक सीख सकता है जैसे कि उन्होंने सत्यभामा के अभिमान को नष्ट किया, जैसा कि श्री हरिवंश और अन्य भक्ति शास्त्रों में बताया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)