मेरी राय में, भगवान का अपने प्रियतम सेवकों के अधीन आना किसी भी प्रकार का दुःख या दोष उत्पन्न नहीं करता। बल्कि, इससे अपार आनंद उत्पन्न होता है और भगवान के ऐसे गौरवशाली गुणों का संचार होता है जैसे कि अपने भक्तों के प्रति उनकी स्नेहमयी चिंता।
In my opinion, the Lord's submission to His beloved devotees does not cause any sorrow or guilt. Rather, it produces immense joy and radiates such glorious qualities of the Lord as His loving concern for His devotees.
तात्पर्य
दूसरों के विचारों का उल्लेख करने के बाद की परमेश्वर का व्यक्तित्व प्रेमा-भक्ति क्यों नहीं देता है, नारद अब अपने बारे में बताते हैं। सबसे पहले, उन्होंने इस विचार का खंडन किया कि प्रभु अपनी स्वतंत्रता खोने से बचना चाहते हैं। प्रभु अपने भक्तों को कोई तकलीफ नहीं देते जब वह खुद को उनकी इच्छाओं के अधीन कर देते हैं, न ही अपनी स्वतंत्रता को आत्मसमर्पण करने से उन्हें नुकसान होता है। बल्कि, ये अंतरंग व्यवहार पूरे विश्व में खुशी लाते हैं, और वे भगवान की उदारता और भक्तों के लिए चिंता के लिए उनकी प्रसिद्धि को फैलाते हैं। क्योंकि अपने भक्तों के लिए भगवान का समर्पण उनके पारस्परिक आनंद को बढ़ाता है, यह दुख के बजाय खुशी का एक स्रोत है; इसके अलावा, क्योंकि यह उनकी महिमा को बढ़ाता है, यह दोषपूर्ण नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥