श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 225
 
 
श्लोक  2.4.225 
अतो ’न्यान्य् अति-तुच्छानि
सर्व-काम-फलानि हि
मुक्तिश् च सु-लभान्य् अस्मात्
तद्-भक्तिर् न तु तादृशी
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अन्य सभी कामनाओं के फल, यहाँ तक कि मोक्ष भी, तुच्छ हैं। भगवान् से तो ये आसानी से प्राप्त हो जाते हैं, किन्तु उनकी शुद्ध भक्ति नहीं।
 
Thus, the fruits of all other desires, even liberation, are trivial. These are easily obtained from the Lord, but not pure devotion to Him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)