कुछ वैष्णव प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त होते हैं, और अन्य अभी भी अच्छाई, जुनून और अज्ञानता से बंधे होते हैं। इस श्लोक में वर्णित आक्रामक उपासक भगवान के निम्नतम भक्त होते हैं। श्रीमद-भागवतम (11.2.47) में उन्हें प्राकृत ("भौतिकवादी") कहा गया है:
अर्चायां एव हरये
पूजां यः श्रद्धयेहते
न तद्-भक्तेषु चान्येषु
स भक्तः प्राकृतः स्मृतः
"एक भक्त जो मंदिर में देवता की पूजा में विश्वासपूर्वक लगा रहता है, लेकिन अन्य भक्तों या आम लोगों के प्रति ठीक से व्यवहार नहीं करता है, उसे प्राकृत-भक्त कहा जाता है, जो एक भौतिकवादी भक्त है, और माना जाता है कि वह सबसे निम्न स्थिति में है।"
शास्त्रीय कथन प्रतीमा मंद-बुद्धिनाम ("देवता कम बुद्धिमानों के लिए है") भक्तों के इस निम्न वर्ग को संदर्भित करता है, जिनमें आध्यात्मिक भेदभाव की कमी होती है। उन्हें शास्त्रों में वर्णित देवता पूजा के लाभ प्राप्त नहीं होते हैं।
यो माँ सर्वेषु भूतेषु
संतमात्मानमीश्वरम
हित्वार्चां भजते मौढ्याद
भस्मनी एव जुहोति सः
"वह व्यक्ति जो मंदिरों में भगवद् गीता के देवता की पूजा करता है, लेकिन यह नहीं जानता कि सर्वोच्च भगवान, परमात्मा के रूप में, प्रत्येक जीवित इकाई के हृदय में स्थित है, अज्ञान में होना चाहिए और उसकी तुलना किसी ऐसे व्यक्ति से की जाती है जो राख में आहुति देता है।" (भागवतम 3.29.22) दूसरे शब्दों में, भगवान का व्यक्तित्व उनकी पूजा स्वीकार नहीं करता है।
जैसा कि भगवान नृसिंह से प्रार्थना में श्री प्रह्लाद महाराज ने कहा है:
नैवात्मनः प्रभुरायं निज-लाभ-पूर्नो
मानं जनाद विदुषः करुणो वृणीते
यद् यज् जनो भगवते विदधीत मानं
तच्चात्मने प्रति-मुखस्य यथा मुख-श्रीः
"सर्वोच्च भगवान, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, हमेशा स्वयं में पूरी तरह से संतुष्ट रहते हैं। इसलिए जब उन्हें कुछ चढ़ाया जाता है, तो भगवान की दया से, चढ़ावा भक्त के लाभ के लिए होता है, क्योंकि भगवान को किसी से सेवा की आवश्यकता नहीं होती है। एक उदाहरण देने के लिए, यदि किसी के चेहरे को सजाया जाता है, तो दर्पण में उसके चेहरे का प्रतिबिंब भी सजा हुआ दिखाई देता है।" (भागवतम 7.9.11)
इस प्रार्थना में, प्रह्लाद ने भगवान नृसिंह को सभी जीवित आत्माओं के व्यक्तिगत स्वामी (प्रभु) और प्रह्लाद के अपने जीवन और आत्मा (आत्मनोः प्रभुः अयम) के रूप में वर्णित किया है। जीवों के पास जो कुछ भी है वह वास्तव में सर्वोच्च भगवान का है। फिर भी, भगवान, दयालु होने के नाते, भौतिकवादी मूर्खों (जनद विदुशः) के सम्मान और चढ़ावे को अस्वीकार करते हैं। उनकी मूर्खता के लक्षण यहाँ ब्रह्द-भागवतामृत में वर्णित किए गए हैं: ऐसी वातानुकूलित आत्माएँ सर्वोच्च भगवान के देवता को एक भौतिक प्रतिमा मानती हैं और उनकी पूजा एक खाली अनुष्ठान है, और वे भगवान के भक्तों और सामान्य रूप से जीवित प्राणियों का अपमान करती हैं। इसलिए भगवान को उनके प्रसाद में कोई दिलचस्पी नहीं है। श्री नारद ने भी श्रीमद-भागवतम (4.31.21) में कहा है:
ना भजति कु-मनीषिणां सा इज्यां
हरिरधनआत्म-धन-प्रियो रस-ज्ञः
श्रुत-धन-कुल-कर्मणां मदैर्ये
विदधति पापम अकिंचनेषु सत्सु
"सर्वोच्च भगवान का व्यक्तित्व उन भक्तों के लिए बहुत प्रिय हो जाता है जिनके पास कोई भौतिक संपत्ति नहीं है लेकिन भगवान की भक्ति सेवा में पूरी तरह से खुश हैं। वास्तव में, भगवान ऐसे भक्तों की भक्ति गतिविधियों का आनंद लेते हैं। लेकिन जो व्यक्ति भौतिक शिक्षा, धन, अभिजात्य और कामुक गतिविधि से भरे हुए हैं, उन्हें भौतिक चीजों के अधिकारी होने पर बहुत गर्व होता है, और वे अक्सर भक्तों का उपहास करते हैं। भले ही ऐसे लोग भगवान की पूजा चढ़ाते हैं, भगवान उन्हें कभी स्वीकार नहीं करते हैं।"
ऊपर उद्धृत प्रह्लाद महाराज की प्रार्थना को समझने के कई अलग-अलग तरीके हैं। सर्वोच्च भगवान अपनी संपत्ति से पूरी तरह से संतुष्ट हैं इसका मतलब यह है कि वह अपनी तीव्र आनंद की भावनाओं से संतुष्ट हैं। फिर भी, वे बुद्धिमान भक्तों के प्रसाद को स्वीकार करते हैं, और क्योंकि वह अपने भक्तों के प्रति बहुत दयालु हैं, इसलिए उनके लाभ के लिए वह चरित्र से बाहर काम करते हैं, आभारी रूप से भेंट स्वीकार करते हैं, भले ही उन्हें इसकी आवश्यकता न हो। या, दूसरे दृष्टिकोण से, शब्द निज-लाभा-पूर्न इंगित करते हैं कि भगवान पूरी तरह से संतुष्ट (पूर्ण) हो जाते हैं प्रेम द्वारा, लाभा (प्राप्ति) उनके अंतरंग भक्तों (निज) द्वारा हासिल की जाती है। या वह उनकी पूजा से संतुष्ट होते हैं (लाभा जो उन्हें उनसे प्राप्त होता है)। क्योंकि वह अपने शुद्ध भक्तों से अपनी इच्छाओं की पूर्ति प्राप्त करते हैं, वह दूसरों की पेशकशों से आकर्षित नहीं होते हैं।
हालाँकि, किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि अपूर्ण उपासक केवल भगवान के लिए खर्च की गई संपत्ति और अन्य संसाधनों को बर्बाद करते हैं। जब कोई सर्वोच्च व्यक्ति की किसी भी रूप में पूजा करता है, तो इसका परिणाम हमेशा अपने लाभ (आत्मने) के लिए होता है। प्रह्लाद महाराज द्वारा दिया गया उदाहरण यह है कि व्यक्ति की सुंदर विशेषताएं, माथे पर शुभ तिलक सहित, स्वाभाविक रूप से दर्पण में परिलक्षित उसकी छवि के साथ दिखाई देती हैं। परन्तु प्रतिबिंब की सुंदरता केवल व्यक्ति की मूल सुंदरता की एक झलक है। उसी तरह, अनुष्ठान पूजा शुद्ध भक्ति का केवल एक साँचा है। इसलिए भौतिकवादी उपासक भक्ति सेवा के प्राथमिक लक्ष्य- शुद्ध प्रेम- को प्राप्त नहीं कर पाते हैं, क्योंकि भगवान वास्तव में उनके चढ़ावे से प्रसन्न नहीं होते हैं। वे केवल भौतिक लाभ प्राप्त करते हैं।
प्रह्लाद की प्रार्थना को देखने का एक और तरीका यह है कि यद्यपि भगवान बहुत दयालु हैं, वे मूर्खों की पूजा स्वीकार नहीं करते हैं, जिनके पास आध्यात्मिक ज्ञान की कमी है और जो भगवान की खुशी के लिए नहीं, बल्कि अपने स्वार्थी उद्देश्यों (आत्माने) के लिए पूजा करते हैं। लेकिन ऐसे लोग अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए भगवान की पूजा क्यों करते हैं? क्योंकि उसे अर्पित किए बिना वे अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सकते, जैसे दर्पण उस चेहरे की सुंदर सजावट को प्रतिबिंबित नहीं कर सकता जिसे सजाया नहीं गया है।
दूसरे दृष्टिकोण से, करुणावश एक बुद्धिमान भक्त जो कुछ भी उन्हें अर्पित करता है, परम भगवान उसे स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन यदि कोई भक्त स्वार्थी उद्देश्यों के लिए भगवान की पूजा करता है, तो परिणाम जो हो सकता था उसका केवल एक झलक होता है, जैसे किसी व्यक्ति की सुंदरता दर्पण में दिखाई देती है। अपरिपक्व भक्त को शुद्ध भक्ति की वास्तविक सफलता के बदले कुछ महत्वहीन पुरस्कार मिलता है। इसलिए केवल भगवान के व्यक्तित्व को प्रसन्न करने के शुद्ध उद्देश्य से की गई पूजा ही प्रेम-भक्ति के खजाने की ओर ले जाती है, जिसमें भक्त श्री वैकुंठ या भगवान के किसी अन्य निवास को प्राप्त करता है और उन्हें व्यक्तिगत रूप से देखने और उनके साथ जुड़ने में सक्षम होता है।
एक और समझ यह है कि चूँकि सर्वशक्तिमान सर्वोच्च व्यक्ति पहले से ही अपनी उपलब्धियों से पूरी तरह संतुष्ट है, इसलिए उसे वास्तव में भौतिकवादी जीवात्माओं के प्रसाद में कोई दिलचस्पी नहीं है। लेकिन भले ही भगवान के पास अपने लाभ के लिए ऐसी पूजा को स्वीकार करने का कोई कारण नहीं है, फिर भी वह अपने उपासकों के लाभ के लिए इसे स्वीकार क्यों नहीं करते? इसका उत्तर यह है कि जब भगवान ऐसे मूर्ख व्यक्तियों के प्रसाद को अस्वीकार कर देते हैं जो यह नहीं जानते कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं, तो वह वास्तव में अपनी दया प्रदान कर रहे हैं। किसी ऐसे व्यक्ति की हताशा और चिंता को देखकर, जिसने भक्ति के बिना अनुष्ठानिक पूजा के लिए धन और प्रयास खर्च किया है, भगवान दयापूर्वक पूजा की उपेक्षा करते हैं ताकि भौतिकवादी व्यक्ति को अपने बेकार प्रयास को रोकने के लिए प्रेरित किया जा सके।
फिर, भगवान की पूजा करने का प्रयास करने वाला व्यक्ति पूजा करने का उचित तरीका न जानने के अर्थ में नासमझ (अविदुषः) हो सकता है। उदाहरण के लिए, बलिदान देने के दौरान, वह निर्दोष जानवरों के खिलाफ हिंसा कर सकता है। फिर भी, क्या सभी पूज्य प्रभुओं के मुखिया को ऐसे उपासक को भी पुरस्कृत नहीं करना चाहिए? उत्तर, फिर, यह है कि सर्वोच्च व्यक्ति सर्व दयालु है। यदि वह लाभ देकर ऐसी पेशकश को प्रोत्साहित करता, तो वह बलिदान के पीड़ितों को नुकसान पहुंचाता।
अथवा, अपनी संपत्ति से संतुष्ट होकर, भगवान न तो अपने लिए प्रसाद स्वीकार करते हैं और न ही अपने उपासकों के लिए उन्हें स्वीकार करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि भौतिकवादी उपासक कम बुद्धिमान होते हैं और भगवान बहुत दयालु होते हैं। सामान्य तौर पर कोई व्यक्ति निश्चित नहीं हो सकता कि वह भगवान को जो श्रद्धांजलि अर्पित करता है, उसका परिणाम उसे ही लाभ होगा या नहीं। वह बस अज्ञानता में अपना श्रम जारी रखता है, पूजा के लिए आवश्यक वस्तुओं को इकट्ठा करने में परेशानी उठाता है। इस बीच, भगवान, जो उपासक को ऐसी असुविधा झेलते हुए देखना बर्दाश्त नहीं कर सकते, पूजा स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं, इस प्रकार अपनी सर्वोच्च करुणा दिखाते हैं।
तो फिर, एक सामान्य व्यक्ति द्वारा भगवान की पूजा करने का प्रयास किस काम का है? यह प्रयास उपयोगी है क्योंकि यह अंततः व्यक्ति की पूर्ण पूर्ति (आत्माने) की ओर ले जा सकता है जबकि कोई अन्य प्रयास ऐसा नहीं करेगा। दर्पण में प्रतिबिंबित चेहरे की सुंदरता केवल उसकी अपनी सुंदरता होती है, किसी और की नहीं। मूल सौन्दर्य के बिना कोई भी सौन्दर्य प्रतिबिम्ब में प्रकट नहीं होगा। दूसरे शब्दों में, भक्ति सेवा के लिए एक उम्मीदवार को सर्वोच्च भगवान को संतुष्ट करने के लिए, भले ही अपूर्ण हो, प्रयास करना चाहिए। जीवन की पूर्णता प्राप्त करने का कोई अन्य मार्ग नहीं है।
और प्रह्लाद की प्रार्थना को समझने का एक और तरीका यह है: सर्वोच्च भगवान, सभी जीवित प्राणियों (आत्मान:) के व्यक्तिगत मित्र और स्वामी (प्रभु:) होने के नाते, तब संतुष्ट (पूर्ण) होते हैं जब उनके भक्त सफल होते हैं (निज-लाभ) और जब वह कर सकते हैं इस प्रकार उनका प्रेमपूर्ण सहयोग है। या भले ही भगवान पहले से ही पूरी तरह से संतुष्ट हैं, उनकी सभी इच्छाएँ उनके शुद्ध भक्तों द्वारा पूरी की जाती हैं, क्या वे कम बुद्धिमान व्यक्तियों का भी प्रसाद स्वीकार नहीं करते हैं? बेशक वह ऐसा करता है, और वह उनकी पूजा को स्वीकार करने के लिए अपने रास्ते से हट जाता है। लेकिन क्यों? क्योंकि वह सर्व दयालु है। यदि वह उनकी पूजा करने वालों का प्रसाद स्वीकार नहीं करते, तो वे पूजा करने वाले कभी भी अपनी वांछित सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। जब तक जीव भगवान को जो कुछ भी वे कर सकते हैं अर्पित नहीं करते, वे कोई वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। यहां तक कि अशुद्ध पूजा भी, जो अल्पावधि में केवल मामूली रूप से फलदायी होती है, धीरे-धीरे पूर्ण पूर्णता की ओर ले जाएगी यदि सर्वोच्च भगवान कृपया पूजा को स्वीकार कर लें।
