यथा धरांलम्बन-रत्न-भूता
नारायणो 'सौ स नरो 'थ दत्तः
श्री-जामदग्न्यः कपिलादयो 'पि
ये कौतूकाच्च प्रतिमा-स रूपाः
ये स्वर्ग-लोकादिषु विष्णु-यज्ञेश-
वरादयो 'मी भवतैव दृष्टाः
मत्स्यो 'थ कूर्मश्च महा-वराहः
श्रीमन्-नृसिंहो ननु वामनश्च
अन्ये 'वताराश्च तथैव तेषां
प्रत्य-एकम् ईहाभिधया प्रभेदाः
ते सच्-चित्-आनन्द-घना हि सर्वे
नानात्व-भावो 'पि सदाएक-रूपाः
"ऐसे भी लोग हैं जो चंचलता से देवताओं की उपस्थिति ग्रहण करते हैं.... भगवान के ये प्रत्येक रूप की अपनी गतिविधियाँ और नाम होते हैं, फिर भी ये सभी पूर्ण रूप से अनंत काल, ज्ञान और आनंद में हैं। विविधता प्रकट करने के बावजूद, पदार्थ में वे हमेशा एक और एक ही होते हैं।"
