श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 194
 
 
श्लोक  2.4.194 
वैकुण्ठ-वासिनो ह्य् एते
केचिद् वै नित्य-पार्षदाः
परे कृष्णस्य कृपया
साधयित्वेमम् आगताः
 
 
अनुवाद
इनमें से कुछ वैकुण्ठवासी भगवान कृष्ण के शाश्वत सहयोगी हैं, तथा अन्य उनकी कृपा से यहाँ प्रवेश का सौभाग्य प्राप्त करके आये हैं।
 
Some of these residents of Vaikuntha are eternal associates of Lord Krishna, and others have come here by His grace, having obtained the good fortune of entering here.
तात्पर्य
क्योंकि परम भगवान के सेवक भी संविधान रूप से उतने ही विशुद्ध आध्यात्मिक हैं जितने कि वे, कोई संदेह हो सकता है कि भक्तों और भगवान के बीच कोई अंतर हो सकता है, सेवक और सेवा किए जाने के बीच कोई अंतर हो सकता है। 194 से 199 तक के पाठ इस संदेह को दूर करते हैं। वैकुंठ के कुछ निवासी हमेशा से वहीं रहे हैं, जैसे अनंत शेष और गरुड़। अन्य, जैसे भरत, प्रियव्रत, और जय और विजय, भौतिक दुनिया से वैकुंठ आए हैं और अपेक्षाकृत हाल ही में भगवान के सहयोगी बने हैं, भक्ति सेवा का सफलतापूर्वक अभ्यास करने के बाद वैकुंठ में प्रवेश प्राप्त किया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)