भक्तों के बीच पदानुक्रम की कल्पना केवल उनकी अपनी सेवा के स्वरूप के अनुसार तथा प्रत्येक भक्त को भगवान के साथ अपने रिश्ते से प्राप्त होने वाली खुशी के अनुसार की जाती है।
The hierarchy among devotees is conceived solely according to the nature of their respective service and the happiness each devotee derives from his relationship with the Lord.
तात्पर्य
हर शुद्ध वैष्णव को उसकी भक्ति मनोवृत्ति के अनुसार ही फल मिलता है। तब श्रेष्ठ और निम्न भक्तजनों का वर्गीकरण किस आधार पर? सच तो यही है कि ऐसा वर्गीकरण होता नहीं है। भक्तों के भिन्न-भिन्न प्रकार की सेवाओं की तुलना करने के लिए ही यह मात्र एक कल्पना है। हर एक संबंध, या रस और उसके अनुसार सुख कि किस्मों को आसानी होने के कारण सापेक्ष पूर्णता की विभिन्न डिग्रियों के रूप में मापा जा सकता है। नौ भक्ति पद्धतियों में जैसे कि श्रवण तथा कीर्तन, तथा भिन्न-भिन्न सेवाएँ जो कि भक्तजन वैकुंठ और दूसरे जगहों पर प्रभु को समर्पित करते हैं-प्रभु की व्यक्तिगत सेवा में, उनके चरणों की मालिश करना, उनके शिर को संवारना, एक द्वारपाल के रूप में उनकी सेवा करना-हर एक भक्त अपनी-अपनी सेवा से यथासंभव सर्वोच्च सुख का आनंद उठाता है। इन सेवाओं के वर्गीकरण के आधार पर भी सुख के वर्गीकरण की कल्पना की जा सकती है और इस प्रकार भक्तों की उपाधि दी जा सकती है। परंतु भले ही कई लोगों की मान्यता के अनुसार, यह वर्गीकरण वास्तविक है, फिर भी कोई भी शुद्ध वैष्णव अपने आप को वंचित नहीं समझता; प्रभु के सारे भक्त एकदम संतुष्ट और प्रसन्नचित रहते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥