श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 192
 
 
श्लोक  2.4.192 
न सच्-चिद्-आनन्द-घनात्मनां हि
स्व्-अल्पे ’पि सौख्ये बहु-सौख्य-बुद्धिः
सांसारिकाणाम् इव नापि तुच्छ-
सुखानुभूतिर् यतिनाम् इव स्यात्
 
 
अनुवाद
चूँकि भगवान के शुद्ध भक्त अपनी वास्तविक पहचान, शाश्वतता, ज्ञान और आनंद में लीन रहते हैं, इसलिए वे निम्न सुख को महान नहीं मानते। न ही वे भौतिकवादियों या निराकारवादी संन्यासियों के क्षुद्र सुखों में लिप्त होते हैं।
 
Because pure devotees of the Lord are absorbed in their true identity, eternity, knowledge, and bliss, they do not consider inferior pleasures to be great. Nor do they indulge in the petty pleasures of materialists or impersonal ascetics.
तात्पर्य
सामान्य लोग अज्ञानता से तुच्छ सुख को महान मान सकते हैं, पर वैष्णव मूर्ख नहीं बनते। क्योंकि जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसे भौतिकवादी इंद्रियतृप्ति की इच्छाओं से प्रेरित होते हैं, ऐसे भौतिकवादी इंद्रिय संपर्क की उत्तेजना को वास्तविक खुशी मानते हैं। इसी तरह, अपनी आध्यात्मिक पहचान के ज्ञान की खेती करने वाले निराकारवादी त्यागी मुक्ति में वास्तविक खुशी खोजने की आशा रखते हैं। हालाँकि, ज्यादातर मामलों में, निराकारवादी सन्यासी उस छोटी-मोटी खुशी तक भी नहीं पहुँच पाते जिसकी वे आकांक्षा रखते हैं। भौतिकवादियों और निराकारवादियों दोनों के लिए निराशा का कारण आध्यात्मिक आत्मा के रूप में अपने स्वयं के वास्तविक स्वरूप को महसूस करने में उनकी विफलता है। एक व्यक्ति जो वास्तव में खुद को शुद्ध आत्मा के रूप में महसूस करता है, वह कभी भी भौतिक सुख को पूर्ण नहीं मान सकता है, न ही उसे तुच्छ इंद्रिय तृप्ति द्वारा या निराकार मुक्ति की तुच्छ खुशी से प्रेरित किया जा सकता है, क्योंकि वह सबसे गहन आनंद में डूबा रहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)