उपासनानुसारेण
दत्ते हि भगवान् फलम्
न तत्रापरितोषः स्यात्
कस्यचित् साध्य-लाभतः
अनुवाद
मनुष्य जिस प्रकार से आराधना करता है, उसके अनुसार भगवान उसे अलग-अलग फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार जो व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है, उसे कभी भी असंतोष का अनुभव नहीं होता।
God bestows different rewards upon a person according to the manner in which he worships Him. Thus, a person who reaches his goal never experiences dissatisfaction.
तात्पर्य
ईश्वर के व्यक्तित्व में वह सब कुछ है जो जानने योग्य है। वह दान करने वाले सबसे दयालु भी हैं। तो फिर वह अपने सभी भक्तों को समान परम सुख क्यों नहीं देते? ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जो देता है वह उनकी इच्छाओं पर निर्भर करता है। तो क्या वे भक्त असंतुष्ट नहीं होते जो अपेक्षाकृत कम सुख प्राप्त करते हैं? नहीं। जब परम भगवान अपने किसी भी शुद्ध भक्त के प्रेम का प्रतिदान करते हैं, तो भक्त कभी भी अधूरा महसूस नहीं करता, क्योंकि वह सब कुछ जो भक्त चाहते थे, भगवान प्रदान करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥