श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 187
 
 
श्लोक  2.4.187 
नारायणाद् अप्य् अवतार-भावे
संव्यज्यमानैर् मधुरैर् मनो-ज्ञैः
तत्-प्रेम-भक्त्यार्द्र-हृद्-एक-वेद्यैर्
माहात्म्य-वर्गैर् विविधैर् विशिष्टः
 
 
अनुवाद
और कृष्ण नारायण से भिन्न हैं, क्योंकि जब कृष्ण भौतिक जगत में अवतरण करते हैं तो वे अनेक अद्वितीय महिमाओं को पूर्ण रूप से प्रकट करते हैं जो अकेले कृष्ण को ही विशिष्ट बनाती हैं - आकर्षक, मनमोहक महिमाएँ जिन्हें केवल प्रेम-भक्ति से कोमल हृदय ही जान सकते हैं।
 
And Krishna is different from Narayana because when Krishna descends into the material world, He fully manifests the many unique glories that distinguish Krishna alone—attractive, captivating glories that can only be known by hearts softened by loving devotion.
तात्पर्य
कोई यह शंका उठा सकता है कि वैकुंठ के स्वामी नारायण वेदों में अवतारी या सभी अवतारों के स्रोत के रूप में भी बताए गए हैं, तो फिर श्री कृष्ण नारायण से बड़े कैसे हो सकते हैं? इस श्लोक में नारद इसका उत्तर देते हैं। कृष्ण सभी पर विजयी सर्वोच्च ईश्वर हैं, जो वैकुंठ के स्वामी सहित हर किसी से बड़े हैं। जब कृष्ण भौतिक जगत में अवतरित होते हैं, तो वे विशेष रूप से मधुर गुणों को प्रकट करते हैं जो सभी के हृदयों को आकर्षित करते हैं। किस प्रकार के गुण श्री कृष्ण को सभी अवतारों से श्रेष्ठ बनाते हैं, यहाँ तक कि अवतारी नारायण से भी? इस विषय को अच्छी तरह समझने के लिए व्यक्ति को कृष्ण के प्रति पवित्र प्रेम से कोमल हृदय की आवश्यकता होती है। लेकिन उस आवश्यकता के बिना भी कोई यह विचार कर सकता है कि भगवान के अधिकांश रूप, जैसे बदरिकाश्रम के नारायण, केवल अवतार हैं, जबकि सर्वोच्च नियंत्रक श्री नारायण, वैकुंठ के स्वामी, अवतार नहीं बल्कि अवतारी हैं। फिर भी, कृष्ण अवतारी और अवतार दोनों हैं। इस प्रकार कृष्ण अपनी अवतार भूमिका में अपने विविध कार्यों की मधुरता और अवतारी भूमिका में परम नियंत्रक की सर्वोच्च स्थिति को प्रदर्शित करते हैं। इसलिए कृष्ण भगवान का सबसे महान रूप हैं। श्री बृहद-भागवतामृत के बाद के अध्यायों में कृष्ण के विशेष गौरवों पर आगे चर्चा की जाएगी। यहाँ तक कि कृष्ण के वे लीलाएँ जिसमें वे दुष्ट व्यक्तियों को हराते और मारते हैं, किसी के भी वर्णन या तर्क द्वारा अनुमान से अधिक मधुर और आकर्षक हैं, क्योंकि कृष्ण द्वारा मारा गया प्रत्येक शत्रु कृष्ण की पूरी दया प्राप्त करता है। इसके अलावा, कृष्ण जिस तरह राक्षसों को हराते और मारते हैं, वह अत्यंत आकर्षक है, जबकि कृष्ण अपने समर्पित भक्तों के साथ दयालुता से प्रतिदान करते हैं, उसका क्या कहना। उन सभी के साथ वे उनके रस के अनुसार प्रतिदान करते हैं - उनके साथ भोजन साझा करना, उनके साथ विश्राम करना, उनकी खुशी के लिए अपनी बाँसुरी बजाना, रास-लीला में उनके साथ नाचना, और इसी तरह। इसका वर्णन बाद में और अधिक विस्तार से किया जाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)