श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 185
 
 
श्लोक  2.4.185 
एवं भगवता तेन
श्री-कृष्णेनावतारिणा
न भिद्यन्ते ’वतारास् ते
नित्याः सत्याश् च तादृशाः
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार आदि पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार भी उनसे, जो उनके स्रोत हैं, भिन्न नहीं हैं। जिस प्रकार वे शाश्वत और वास्तविक हैं, उसी प्रकार वे भी हैं।
 
Similarly, the incarnations of the Supreme Personality of Godhead, Sri Krishna, are not different from Him, their source. Just as He is eternal and real, so are they.
तात्पर्य
अब नारद अपने मुख्य बिंदु पर आ रहे हैं: श्री कृष्णदेव सर्वोच्च भगवान के अन्य रूपों से श्रेष्ठ हैं। कृष्णस्तु भगवान स्वयम्: "कृष्ण स्वयं भगवद् व्यक्तित्व के स्रोत हैं।" (भागवत १.३.२८) गोप-कुमार को इस बिंदु के लिए तैयार करने के लिए नारद अब तक कही बातों का सारांश देते हुए कहते हैं कि ईश्वर के सभी अवतार कृष्ण के समान हैं क्योंकि वे सभी उनके नित्य (अनन्त) और सत्य (वास्तविक) होने के गुण साझा करते हैं। इस प्रकार ईश्वर के सभी रूप जैसे कि भगवान बद्रीनाथ और भगवान वैकुंठनाथ, भगवान गोलोकानाथ से भिन्न नहीं हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)