जैसे कि इस श्लोक में सदा शब्द इंगित करता है, पारलौकिक विविधता का प्रकटीकरण शाश्वत है और हमेशा विस्तारित होता जा रहा है। श्री विष्णु-संहिता के शब्दों में:
इच्छा-शक्तिर् ज्ञान-शक्तिर
क्रिया-शक्तिर इति त्रिधा
शक्ति-शक्तिमतोश् चा पि
ना भेदाः कश्चिद् इष्यते
"वह तीन ऊर्जाओं में विस्तारित होती है - इच्छा की ऊर्जा, ज्ञान की ऊर्जा और क्रिया की ऊर्जा। ऊर्जा और उसके स्वामी के बीच कभी भी कोई अंतर नहीं पाया जा सकता है।"
दूसरे अध्याय के अंत में, पूर्ण सत्य के भीतर विविधता की प्रकृति पर पहले ही विस्तार से चर्चा की जा चुकी है। संक्षेप में, भगवान नारायण के पास कद्रू के पुत्र शेष और विनता के पुत्र गरुड़ जैसे विभिन्न सहयोगी हैं। श्री नारायण का वैकुंठ भौतिक जगत में श्वेतदीप और रामाप्रिया-लोक जैसे विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। उनकी भक्तिमय सेवा के विभिन्न अंगों (अंगों) में सुनने और जपने से शुरू होकर विभिन्न रुचियाँ दिखाई देती हैं। अपने विविध लीलाओं में वे अपने भक्तों के प्रति अपनी करुणामयी चिंता जैसे कई अद्भुत गुणों का प्रदर्शन करते हैं। और अपने सर्वोच्च निवास में वे अपनी माँ के स्तन का दूध पीने, जमीन पर रेंगने और बच्चों के खेल खेलने जैसे विभिन्न तरीकों से स्वयं का आनंद लेते हैं।
