श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 171
 
 
श्लोक  2.4.171 
यस्या एव विलोलायाः
प्रायः सर्वत्र कथ्यते
नवानाम् अपि भक्तानां
भगवत्-प्रियताधिका
 
 
अनुवाद
सर्वत्र यह कहा गया है कि भगवान को नये भक्त भी लक्ष्मी के उस रूप से अधिक प्रिय हैं, जो प्रायः अत्यंत चंचल होता है।
 
It is said everywhere that even new devotees are more dear to God than that form of Lakshmi, which is usually very fickle.
तात्पर्य
पुराणों और अन्य शास्त्रों के अनुसार, श्रद्धा रखने वाले परिपक्व, अनुभवी भक्तों से भी अधिक, ईश्वर को नवीन भक्तों का सादगी-भरा भक्ति भाव अधिक प्रिय होता है। क्‍यों? क्‍योंकि इस बहाने कि दुर्वासा ने उसे श्राप दिया, या किसी अन्‍य बहाने के कारण, लक्ष्‍मी हमेशा एक स्‍थान से गायब होती है और दूसरी जगह प्रकट होती है। अत: वह किसी भी क्षण ऐसे लोगों का साथ छोड़ सकती है, जो उसके आश्रय में आते हैं। फिर भी, क्‍योंकि वह महालक्ष्मी का ही एक अवतार है, इसलिए उसमें भाग्‍य की मूल देवी के कई अतिउत्‍तम गुण हैं। इस प्रकार, हम सुनते हैं कि जब क्षीर सागर के मंथन के दौरान भौतिक लक्ष्‍मी प्रकट हुई, तो भगवान विष्‍णु ने उसे अपनी पत्‍नी के रूप में स्‍वीकार किया और वह उनकी छाती पर निवास करने लगी।

इस लक्ष्‍मी के विपरीत, मूल महालक्ष्‍मी, भगवान नारायण की सबसे प्रिय सेवक है। हमेशा उनकी सेवा के लिए समर्पित, वह हमेशा उनकी छाती पर रहती है और कभी अच्‍छल नहीं होती। भगवान के भक्त हमेशा उस पूज्‍य भाव से पूजा करते हैं; वे कभी भी उसकी उपेक्षा नहीं करते जैसे कि वे उसके भौतिक विस्‍तार का करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)