श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 169
 
 
श्लोक  2.4.169 
सा सदा भगवद्-वक्षः-
स्थले वसति तत्-परा
तस्या एवावतारास् ताः
कृष्णस्येवापरा हि याः
 
 
अनुवाद
वह सदैव भगवान के वक्षस्थल पर निवास करती हैं और पूर्णतः भगवान को समर्पित हैं। उनके अवतार उनसे अभिन्न हैं, जैसे भगवान कृष्ण के अवतार उनसे अभिन्न हैं।
 
She always resides on the Lord's chest and is completely devoted to Him. Her incarnations are inseparable from Him, just as the incarnations of Lord Krishna are inseparable from Him.
तात्पर्य
स्वर्गलोक में और अन्यत्र जहां लॉर्ड विष्णु अवतरित होते हैं, देवी लक्ष्मी अपने अवतारों में उनका साथ देती हैं। इस प्रकार, असंख्य अवतार होने के कारण, वह अपनी पति के दर्जे के बराबर हैं। और जैसे वह एक है, लेकिन असीम व्यक्तिगत रूपों को प्रदर्शित करता है, एक लक्ष्मी के पास अवतारों का एक असीम और विस्तृत पदानुक्रम है, उनमें से कुछ अन्य की तुलना में श्रेष्ठ प्रतीत होती हैं फिर भी वे सभी समान रूप से पारलौकिक हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)