श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 165
 
 
श्लोक  2.4.165 
दुर्वितर्क्या हि सा शक्तिर्
अद्भुता पारमेश्वरी
किन्त्व् अस्यैकान्त-भक्तेषु
गूढं किञ्चिन् न तिष्ठति
 
 
अनुवाद
परम नियन्ता की अद्भुत शक्ति अकल्पनीय है, किन्तु उनके अनन्य भक्तों से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता।
 
The awesome power of the Supreme Controller is unimaginable, but nothing can remain hidden from His exclusive devotees.
तात्पर्य
भगवान के विरोधाभासी भक्तिवृंद का आनंद केवल भगवान के भक्त ही उठा सकते हैं जो उन्हें विशुद्ध भक्ति से समझते हैं। साधारण व्यक्ति कृष्ण की भक्तिवृंद के रहस्यों को नहीं सुलझा सकते हैं, लेकिन ये भक्तिवृंद दयालुतापूर्वक अपने आप को ईमानदार भक्तों के सामने प्रकट करते हैं और ऐसे भक्तों को धीरे-धीरे विशेष भक्ति विकसित करने की अनुमति देते हैं। ब्रह्माजी पहले कृष्ण की रहस्यमयी शक्तियों से हतप्रभ थे, लेकिन बाद में उन्हें प्रबुद्ध कर दिया गया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)