श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  2.4.16-17 
तेषु लोकेष्व् अलोकेष्वा-
वरणेष्व् अपि सर्वतः
दृष्टि-पाते ’पि लज्जेयं
पूज्ये तद्-अधिकारिभिः

लोक-पालादिभिश् चोर्ध्व-
मुखैः साञ्जलि-मस्तकैः
वेगाद् उत्क्षिप्यमाणाभिः
पुष्प-लाजादि-वृष्टिभिः
 
 
अनुवाद
मेरी नज़र उन सभी लोकों, ब्रह्मांडीय क्षेत्रों और ब्रह्मांड के आवरणों पर पड़ी जहाँ मैं पहले जा चुका था, और मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। उन स्थानों के निवासी और अधिष्ठाता मेरा सम्मान कर रहे थे। चेहरे ऊपर उठाए, हथेलियाँ सिर के ऊपर जोड़े, वे ज़ोर-ज़ोर से फूल, भुने चावल और अन्य शुभ प्रसाद मेरी ओर बरसा रहे थे।
 
I looked at all the worlds, cosmic regions, and sheaths of the universe I had visited before, and I felt ashamed. The inhabitants and presiding deities of those realms were paying their respects to me. Faces lifted, palms joined above their heads, they loudly showered flowers, roasted rice, and other auspicious offerings toward me.
तात्पर्य
गोपा-कुमार ने पहले सूर्य मंडल से होकर मोक्ष के धाम की यात्रा की थी, परन्तु वैकुंठ की वर्तमान यात्रा का मार्ग इससे भी अधिक असाधारण था। यह वही मार्ग था जिस पर शुद्ध भक्त चलते हैं जब वे इस भौतिक जगत को छोड़कर आध्यात्मिक जगत की यात्रा करते हैं। कष्टदायक भौतिक मार्गों के विपरीत, यह मार्ग अत्यंत आनंदमय है और वैकुंठ धाम तक ले जाता है, एक ऐसा धाम जो मोक्ष धाम से भी श्रेष्ठ है। गोपा-कुमार पहले चौदह ग्रह प्रणालियों और उससे आगे के क्षेत्रों तक बड़ी कठिनाई के साथ पहुँचे थे, परन्तु अब वह एक के बाद एक आसानी से उनसे होकर निकल गये। वह लोकालोक पर्वत से घिरे हुए ग्रहों को पार करके सृष्टि के उस भाग में पहुँचे जहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता। फिर वह सृष्टि के आठ आवरणों में से प्रत्येक से होकर फिर गुजरे।

महाकाल-पुरा, मोक्ष के धाम की अपनी पहली यात्रा पर, गोपा-कुमार अच्छी तरह से जानते थे कि जिन क्षेत्रों से वह होकर जा रहे हैं वे सभी भौतिक माया के निर्माण हैं। परन्तु, वर्तमान यात्रा में, उनकी अनुभूति अधिक उन्नत थी; वह अब समझ गये कि मुक्ति का भी बहुत कम मूल्य है, इसलिए उन भौतिक आकर्षणों को देखकर भी उन्हें शर्म आती थी जिन्हें उन्होंने कभी रोचक पाया था। सभी ग्रहों से होकर गुजरते हुए, उन्हें इंद्र और अन्य शासकों को सम्मानपूर्वक अभिवादन स्वीकार करना पड़ता था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)