महाकाल-पुरा, मोक्ष के धाम की अपनी पहली यात्रा पर, गोपा-कुमार अच्छी तरह से जानते थे कि जिन क्षेत्रों से वह होकर जा रहे हैं वे सभी भौतिक माया के निर्माण हैं। परन्तु, वर्तमान यात्रा में, उनकी अनुभूति अधिक उन्नत थी; वह अब समझ गये कि मुक्ति का भी बहुत कम मूल्य है, इसलिए उन भौतिक आकर्षणों को देखकर भी उन्हें शर्म आती थी जिन्हें उन्होंने कभी रोचक पाया था। सभी ग्रहों से होकर गुजरते हुए, उन्हें इंद्र और अन्य शासकों को सम्मानपूर्वक अभिवादन स्वीकार करना पड़ता था।
